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हस्तक्षेप.कॉम सौ से ज्यादा पत्रकारों का संयुक्त प्रयास है। काफी लम्बे समय से महसूस किया जा रहा था कि तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है और मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है, उसकी प्रासंगिकता अगर समाप्त नहीं भी हो रही है तो कम तो होती ही जा रही है। तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया या तो पूंजीपतियों का माउथपीस बन कर रह गया है या फिर सरकार का। आज हाशिए पर धकेल दिए गए आम आदमी की आवाज इस मीडिया की चिन्ता नहीं हैं, बल्कि इसकी चिन्ता में राखी का स्वयंवर, राहुल महाजन की शादी, राजू श्रीवास्तव की फूहड़ कॉमेडी और सचिन तेन्दुलकर के चौके छक्के शामिल हैं। कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याएं अब मीडिया की सुर्खी नहीं नहीं रहीं, हां 'पीपली लाइव' का मज़ा जरूर मीडिया ले रहा है। और तो और अब तो विपक्ष के बड़े नेता लालकृष्ण अडवाणी के बयान भी अखबारों के आखरी पन्ने पर स्थान पा रहे हैं।
ऐसे में जरूरत है एक वैकल्पिक मीडिया की। लेकिन महसूस किया जा रहा है कि जो वैकल्पिक मीडिया आ रहा है उनमें से कुछ की बात छोड़ दी जाए तो बहुत स्वस्थ बहस वह भी नहीं दे पा रहे हैं। अधिकांश या तो किसी राजनैतिक दल की छत्र छाया में पनप रहे हैं या फिर अपने विरोधियों को निपटाने के लिए एक मंच तैयार कर रहे हैं।
इसलिए हमने महसूस किया कि क्यों न एक नया मंच बनाया जाए जहां स्वस्थ बहस की परंपरा बने और ऐसी खबरें पाठकों तक पहुचाई जा सकें जिन्हें या तो राष्ट्रीय मीडिया अपने पूंजीगत स्वार्थ या फिर वैचारिक आग्रह या फिर सरकार के डर से नहीं पहुचाता है।
ऐसा नहीं है कि हमें कोई भ्रम हो कि हम कोई नई क्रांति करने जा रहे हैं और पत्रकारिता की दशा और दिशा बदल डालेंगे। लेकिन एक प्रयास तो किया ही जा सकता है कि उनकी खबरें भी स्पेस पाएं जो मीडिया के लिए खबर नहीं बनते।
ऐसा भी नहीं है कि हमारे वैचारिक आग्रह और दुराग्रह नहीं हैं। लेकिन हम एक वादा जरूर करते हैं कि खबरों के साथ अन्याय नहीं करेंगे। मुक्तिबोध ने कहा था 'तय करो कि किस ओर हो तुम'। हमें अपना लक्ष्य मालूम है और हम यह भी जानते हैं कि वैश्वीकृत होती और तथाकथित आर्थिक उदारीकरण की इस दुनिया में हमारा रास्ता क्या है? इसलिए अगर कुछ लोगों को लगे कि हम निष्पक्ष नहीं हैं तो हमें आपत्ति नहीं है।
हम यह भी बखूबी जानते हैं कि पोर्टल चलाना कोई हंसी मजाक नहीं है और जब तक कि पीछे कोई काली पूंजी न हो अथवा जिंदा रहने के लिए आपके आर्थिक रिश्ते मजबूत न हों, या फिर आजीविका के आपके साधनों से अतिरिक्त बचत न हो, तो टिकना आसान नहीं है। लेकिन मित्रों के सहयोग से रास्ता पार होगा ही!
आशा है आपका सहयोग मिलेगा। हमारा प्रयास होगा कि हम ऐसे पत्रकारों को स्थान दें जो अच्छा काम तो कर रहे हैं लेकिन किसी गॉडफादर के अभाव में अच्छा स्पेस नहीं पा रहे हैं। हम जनोपयोगी और सरोकारों से जुड़े लोगों और संगठनों की विज्ञप्तियों को भी स्थान देंगे
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September 8, 2011 at 7:56 am
अन्ना ने आसान कर दी मायावती की राह
September 7, 2011 at 10:33 pm
अजीब दौर है, भ्रष्टाचारी माँ के दुलारे बेटे उसकी सौत ईमानदारी के पक्ष में नारे लगा रहे हैं
September 7, 2011 at 9:07 pm
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हम सब सुरक्षित हैं, यह वहम सा क्यूँ है ?
September 7, 2011 at 8:19 pm
लोक की कमाई तंत्र बनाने में गंवाई
September 7, 2011 at 1:46 pm
Training Programme on Peace and Conflict Resolution
September 7, 2011 at 9:16 am
संगठित वर्ग का बंधक बनता असंगठित समाज
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September 7, 2011 at 8:49 am
September 7, 2011 at 8:20 am
कितने ईमानदार हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ आज़ादी की दूसरी लड़ाई लड़ने वाले ?
जनलोकपाल : परदे के पीछे क्या है ?
अन्ना जी के आंदोलन का साम्प्रदायिक चरित्र
Please do not worship Anna Hazare
अन्ना जी क्रांति की सौदेबाजी में हारी तो जनता है
- अन्ना की टीम के सौ खून माफ
- अन्ना जी, जिसने सच कह दिया उसका बुरा हाल क्यों है?
- इंडियन मुजाहिद्दीन का सच
- क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ?
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- अन्नाइयों को दोस्त और दुश्मन की पहचान नहीं है
- डिजाइनर क्रांतिकारी बनने का बंपर मौका
- राजनीतिक दलों के सदस्यों की आचार संहिता होनी चाहिए
- लोक की कमाई तंत्र बनाने में गंवाई
- प्रधानमंत्री का सन्देश लोकतंत्र में विश्वास नहीं पैदा करता है
- अन्ना जी को मसीहा बनने की जल्दी पडी है
- अब बाबूओं के रास्ते अन्ना आंदोलन को तोड़ने की सरकारी पहल
- और हो गया सौदा आज़ादी की दूसरी लड़ाई का !!!
- हाय अफसोस जंतर-मंतर फिर तहरीर चौक न बन पाया!
- 'आरक्षण' के बहाने 'राजनीति'
- आइए नेता जी, बहिन जी की ताजपोशी के लिए ताली बजाते हैं
- देखो, देखो ! कौन ले रहा है संसद और संविधान की आड़
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- जोशीले युवाओं का होश से लबरेज आंदोलन
- भारतीय शिक्षा और खामियों की बढ़ती खाई
- शिक्षक दिवस : बांझ सम्मान
- एक दिन सम्मान, साल भर अपमान!
- व्यवस्था के शस्त्रागार का एक नया हथियार अण्णा
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- क्या विफल हो रहा है लोकतंत्र ?
- भाकपा ने की दलित ग्राम प्रधान कामरेड सरजू प्रसाद कठेरिया की हत्या की भर्त्सना
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- भ्रष्टाचार के घाट पर …तिलक लेत रघुवीर
- पत्रकार हत्या-2 : वे जो अब नहीं रहे
- निजी से बुरा नहीं सरकारी मीडिया
- कलम के सिपाहियों की खतरे में जिंदगी
- शपथपत्र देकर माया सरकार बचा रही है मंत्री को
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- शिल्पी स्वयसेवी संस्थान ने शिक्षक भर्ती के नाम पर दिया धोखा, जिलाधिकारी ने दिए एफआईआर के आदेश
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