Tuesday, November 1, 2011

National Dad Saint Gandhi aur unka rashtrabhasha HInglish ke prati dedication

National Dad Saint Gandhi aur unka rashtrabhasha HInglish ke prati dedication

From: Prakriti Aarogya Kendra

http://swatantrabhaarat.blogspot.com/2011/10/blog-post.html

National Dad Saint Gandhi aur unka rashtrabhasha HInglish ke prati dedication
From: Prakriti Aarogya Kendra
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बहुत दिनों से सोच रहा था मैं भी आधुनिक बन जाऊं और पिछड़ी सोच का दकियानूसी विचारक का चोला उतार फेंकूं . सोचा, इसकी शुरुआत कहाँ से करूं. मैनें पढ़े लिखे, आधुनिक, और संभ्रांत कहे जाने वाले कुछ लोगों का छुप छुप कर अवलोकन करना प्रारंभ किया. उन्हें शान से सूट पैंट और टाई लगाकर, गर्दन में एक विशेष अकड़ और होठों पर एक विशेष लयबद्धता के साथ अंग्रेजी को जबरदस्ती मातृभाषा में ठूंस ठूंस कर बोलते देखा करता . उन्हें समाज में विशेष सम्मान मिलता देखता तो मेरे कलेजे पर भी सांप लोट जाता था. अंततः निष्कर्ष निकाला, मातृभाषा के शब्दों का अंग्रेजी की तरह उच्चारण करना भी एक प्रकार कि उच्चता को दर्शाता है. अपनी भाषा बोलते बोलते अंग्रेजी में कुछ गिट पिट करना आधुनिकता का पर्याय बन चुका है. बीच बीच में हिंदी के किसी सामान्य शब्द को अंग्रेजी शब्द से बदल कर यह दिखाना कि हमें उसकी हिंदी नहीं आती, (What do you call it in Hindi) जैसे वाक्य हर चार पांच मिनट के संवाद में बोलना भी एक प्रकार कि आधुनिकता और संभ्रांत होने की निशानी है, अन्यथा लोग फिसड्डी समझ बैठेंगे. मेरा भी मन करने लगा था कि मैं भी इन जैसा बन जाऊं.
अब तो हमारी सरकार के राजभाषा विभाग ने भी मन बना ही लिया है कि अगर हिंदी को समृद्ध करना हैं तो अंग्रेजी के शब्दों को बिना हिंदी में ठूंसे यह असंभव है. आखिर हिंदी को बोलना कितना कठिन काम है? छात्र, विद्यालय, शिक्षक जैसे शब्द कितने कठिन, पुराने और घटिया लगते है. अब देखिये स्टुडेंट, स्कूल, टीचर बोलें तो कितना आसान, सभ्य और आधुनिक लगता है. परिचय पत्र तो लगता है जैसे मंगल ग्रह से आनेवालों का पूछा जाता है. इस ग्लोबलाइजेशन के जमाने में तो आईडेनटीटी कार्ड पूछना ही सभ्यता का प्रतीक है.
मैंने कुछ बुद्धिजीवियों से जब इस भाषा के सरलीकरण (खिचड़ीकरण) पर विचार जानना चाहा तो उन्होंने इसका स्वागत किया. उनके अनुसार भाषा विचारों के व्यक्त करने का एक माध्यम भर है. उसे सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, समाज, धर्म, मानसिकता, मनोविज्ञान, दर्शन से जोड़ना उचित नहीं है. भाषा जितनी सरल होगी, बोधगम्य होगी विचार उतना ही रुचिकर होगा. अगर इस आधुनिकता के दौर में सफल लेखक होना है तो इसी प्रकार के बोधगम्य भाषा का प्रयोग करना होगा. फिर मैंने भी एक ऐसा ही बोधगम्य लेख लिखने की ठान ली. सोचा, ऐसा विषय लूं जो हिंदी भाषा का प्रचारक हो, किसी राष्ट्रनायक जिसने हिंदी के लिए अपना सर्वस्व अर्पण किया हो से प्रेरित हो , जन जन के हृदय को उद्वेलित करे और मेरी भाषा सभी को समझ में आ जाए. बहुत सोच विचार कर मैंने एक विषय सोचा है, आशा है आप उसपर अपने विचार व्यक्त करें तो आगे लिखना प्रारंभ करूंगा.
"नॅशनल डैड सैंट गाँधी और उनका राष्ट्रभाषा हिंगलिश के प्रति डेडिकेशन"
अगर देवनागरी में इसका अर्थ समझ में ना आये तो रोमन में भी नीचे लिख ही देता हूँ, आधुनिक बनना है तो देवनागरी प्रेम छोड़कर रोमन प्रेम करना ही पड़ेगा.
National Dad Saint Gandhi aur unka rashtrabhasha HInglish ke prati dedication
आशा है आप सब लोग मुझे आधुनिक बनने में अवश्य ही सहायता प्रदान कर अनुगृहीत करेंगे. धन्यवाद एवं हार्दिक शुभेच्छा,
राकेश चन्द्र
प्रकृति आरोग्य केंद्र
सेंद्रिय, आयुर्वेदिक, वनस्पतीय, प्राकृतिक और स्वदेशी वस्तुओं का वैशेषिक विक्रय केंद्र
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शिक्षा से ही नहीं, नौकरी से भी जाए अंग्रेजी

From: Dr.Kavita Vachaknavee

 

 

 

http://www.youtube.com/watch?v=46GfZUFGHtE&NR=1

प्रो. यशपाल यों तो हैं, वैज्ञानिक लेकिन बात उन्होंने ऐसी कह दी है, जो महात्मा गांधी और राममनोहर लोहिया ही कह सकते थे| आजकल वे एनसीईआरटी की राष्ट्रीय पाठ्रयक्रम समिति के अध्यक्ष हैं| इस समिति का काम देश भर की शिक्षा-संस्थाओं के लिए पाठ्रयक्रम बनाना है| ऐसी कई समितियॉं पहले भी बन चुकी हैं और कई नामी-गिरामी शिक्षाविद उनके अध्यक्ष और सदस्य रहे हैं लेकिन यह पहली बार है कि कोई अध्यक्ष जड़ तक पहुंचा है| पहली बार किसी अध्यक्ष ने कहा है कि बच्चों पर अंग्रेजी थोपी न जाए याने उन्हें वह पढ़ाई तो जाए लेकिन उसमें किसी को फेल न किया जाए|
क्यों कहा है, प्रो. यशपाल ने ऐसा? मुझे पता नहीं कि उनके तर्क क्या हैं लेकिन वे तर्क उनसे अलग क्या होंगे, जो हम बरसों से देते रहे हैं| सबसे पहला तर्क तो यही है कि सबसे ज्यादा बच्चे किसी विषय में फेल होते हैं तो वे अंग्रेजी में ही होते हैं| सरकारी संस्थाऍं इस ऑंकड़े को छिपाकर रखती हैं| 'भारतीय भाषा सम्मेलन' की ओर से अनेक पत्र् लिखने के बावजूद विश्व विद्यालय अनुदान आयोग और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पार्षद कभी यह नहीं बताते कि अंग्रेजी में फेल होनेवाले छात्रें का प्रतिशत क्या है? हमारे सांसद और विधायक क्या कर रहे हैं? उन्हें यह सवाल पूछना चाहिए और अब यह सूचना के अधिकार के तहत अब पूछा ही जाएगा| सच्चाई यह है कि बी.ए. तक पहुंचते-पहुंचते 100 में से 96 बच्चे पढ़ाई से भाग खड़े होते हैं| ऐसा क्यों होता है? अन्य कारण तो हैं ही लेकिन सबसे गंभीर कारण अंग्रेजी की अनिवार्यता है| सारे विषयों की उपेक्षा करके सबसे ज्यादा ध्यान अंग्रेजी पर लगाना पड़ता है और परीक्षा के दिनों में उसी की दहशत दिल में बैठी रहती है| परीक्षा सजा की तरह मालूम पड़ती है और जब परिणाम आते हैं तो अंग्रेजी के कारण ही सबसे ज्यादा शर्मिंदगी उठानी पड़ती है| अन्य विषयों में कोई छात्र् कितना ही प्रवीण हो, अंग्रेजी के कारण वह अयोग्य घोषित हो जाता है या उसका दर्जा घट जाता है| अंग्रेजी योग्यता का पर्याय बन जाती है|
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा में तो अंग्रेजी क़हर ढाती है| यूरोप के कुछ देशों ने भारत की नकल करके अपने बच्चों पर अनिवार्य अंग्रेजी थोपने की कोशिश की| नतीजा यह हुआ कि उन्हें तरह-तरह की बीमारियॉं होने लगी| उनकी भूख मर गई, याददाश्त घट गई, नींद गड़बड़ा गई, सिरदर्द रहने लगा, जुबान हकलाने लगी| विदेशी भाषा वे बच्चे तो सीख ही नहीं पाते, जिनके माता-पिता उसे नहीं जानते| भारत के मुश्किल से 5-6 प्रतिशत माता-पिता थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानते हैं| इसका अर्थ यह हुआ कि गरीबों, ग्रामीणों, पिछड़ों, अनुसूचितों और तथाकथित अल्पसंख्यकों के बच्चों को तो फेल होना ही है| शिक्षा के नाम पर अपने दिमाग में हीनता-ग्रंथि पालना ही है और मौका मिलते ही स्कूली शिक्षा से पिंड छुड़ाना ही है| ऐसे में सर्व शिक्षा अभियान क्या कोरा मज़ाक बनकर नहीं रह जाएगा?
प्रो. यशपाल के अलावा आज तक किसी शिक्षा मंत्री को यह बात क्यों नहीं सूझी कि अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई बच्चों के लिए जानलेवा है| क्या हम भूल गए कि पिछले साल इंजीनियरिंग के छात्र् ब्रजेश जायसवाल और इलाहाबाद के बैंक कर्मचारी रामबाबू ने अंग्रेजी के कारण ही आत्महत्या की थी| अभी-अभी दिल्ली के एक अन्य छात्र् ने भी मरने के पहले यही कारण बताया था| उसके पिता अंग्रेजी माध्यम के स्कूल की फीस नहीं भर सकते थे| हमारे कई मुख्यमंत्री और शिक्षा-मंत्री बाल शिक्षा के साथ बड़ी दुश्मनी कर रहे हैं| वे पहली कक्षा से ही अंग्रेजी को अनिवार्य बना रहे हैं| वे सोचते हैं कि अगर अंग्रेजी से ही नौकरी मिलनी है और सामाजिक हैसियत बननी है तो फिर उसे पॉंचवीं से क्यों, पहली कक्षा से ही क्यों न पढ़ाया जाए? उनका इरादा नेक है लेकिन उनकी कारगुजारी बाल-हत्या से कम नहीं है| आज तक दुनिया के किसी मूर्खतम तानाशाह ने जो काम नहीं किया, वे हमारे मुख्यमंत्री और शिक्षामंत्री कर रहे हैं| अंग्रेजी में किसी को फेल न किया जाए, यह बड़ी नरम मांग है| ज्यादा जरूरी है कि अंग्रेजी की पढ़ाई को एच्छिक बनाया जाए| जिसे अंग्रेजी पढ़ना हो, वह कॉलेज में पढ़े और जमकर पढ़े | साल-दो साल में इतनी अच्छी पढ़ ले कि वह अंग्रेजों को अंग्रेजी सिखाए| हमारी विद्यार्थी अंग्रेजी या किसी भी विदेशी भाषा के गुलाम बनने की बजाय उसके स्वामी बनें| विदेशी भाषा को अपने लाभ का साधन बनाएं न कि उसके गुलाम बन जाएं|
इतना काफी नहीं है कि अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई खत्म हो| यह भी जरूरी है कि अंग्रेजी माध्यम से कोई भी विषय नहीं पढ़ाया जाए| यदि सारे विषय–ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, काम-धंधे आदि अपनी भाषाओं में पढ़ाए जाऍं तो बच्चे उन्हें जल्दी सीखेंगे और बेहतर सीखेंगे| साठ साल तक हमारी शिक्षा में उल्टी खोपड़ी चलती रही| हमने वह मूर्खता की जो दुनिया के किसी भी देश ने नहीं की| यदि हम स्वभाषा का माध्यम बनाते तो अब तक हम चीन और रूस से आगे निकल जाते| क्या अमेरिका, बि्रटेन, फ्रांस, जर्मनी और जापान ने अपने बच्चों को विदेशी माध्यम से पढ़ाया है? अंग्रेजी ने हमारी शिक्षा की गुणवत्ता को तो घटाया ही, उसका विस्तार भी रोका| अंग्रेजी ने देश में अशिक्षा फैलाई| आज भी 70-80 प्रतिशत भारतीय अशिक्षित हैं| 70 प्रतिशत लोग साक्षर हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे शिक्षित हैं| जो सिर्फ अपना दस्तखत कर सके, क्या उसे हम शिक्षित कहेंगे? यदि शत-प्रतिशत भारतीय शिक्षित होते तो भारत कभी का महाशक्ति बन गया होता| बेरोजगारी खत्म हो गई होती| आरक्षण अनावश्यक हो जाता| समतामूलक समाज बनता|
लेकिन ऐसा होना आसान नहीं है, क्योंकि हमारे सवर्ण, शहरी और मुट्ठीभर अंग्रेजीदॉं नेताओं ने अंग्रेजी का जबर्दस्त तिलिस्म खड़ा कर दिया है| उसे नौकरियों से जोड़ दिया है| यह सिर्फ भारत में ही होता है| किसी भी देश में किसी को नौकरी से इसलिए वंचित नहीं किया जाता कि उसे विदेशी भाषा नहीं आती| अंग्रेजी जाने बिना आप भारत में केवल चपरासी या चौकीदार की नौकरी ही पा सकते हैं| इसीलिए गरीब लोगों को अपना पेट काटकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाना पड़ता है| यदि नौकरियों से अंग्रेजी हटा लें तो यह तिलिस्म धड़ाम से जमीन पर आ गिरेगा| कौन बेवकूफ है, जो हिरण पर घास लादेगा? सारे पब्लिक स्कूल साल भर में ही बंद हो जाऍंगे| भारत और इंडिया का भेद पैदा करनेवाली जड़ कट जाएगी| इसीलिए अंग्रेजी सिर्फ शिक्षा में ही नहीं, नौकरी में भी एच्छिक होनी चाहिए| आइए प्रो. यशपालजी, थोड़ा और आगे बढि़ए| हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलिए|
 
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