हिंदी की इस दशा के हम गवाह ही नहीं दोषी भी है !
हिंदी दिवस पर विशेषः- शादाब जफर ''शादाब'' आज हिंदी जिस बुरे दौर से गुजर रही है हम इस के गवाह भी है और गुनाहगार भी। हिंदी बोलने और पढने वालो को आज देश में अनपढ गंवार, मीड़िल क्लास या एकदम नीचे दर्ज का समझा जाता है। संसद हो या बडे बडे आयोजन हमारे देश के.
Government has spent billions of dollars in observing Hindi Divas day, sending big delegations for Hindi to various countries on government expenses, having delegation members who have on interest in promoting Hindi. All government work is still done in English. BJP president Rajnath Singh has said that English has been destroyer of India's culture and has caused a great loss to India.
As compared to Hindi, some regional languages are flourishing very well in India and abroad. In Punjab, Hindi has been almost abolished and there 100% work is done in Punjabi. All signboards are in Punjabi. Due to promotion of Punjabi in foreign countries, Simon Fraser University of Canada will offer Punjabi classes in the coming fall of year 2013 at its Surrey campus.
Urdu as official language: The Majlis-e-Ittehad –ul Muslimeen (MIM) said it would make efforts for increasing the minority budget in both the states of Andhra Pradesh and Telangana "We will strive for protection of Muslim interests not only in one state, but in both the states. "We will demand and ensure that the reservation being given to Muslims is continued in both the states," party MP Asaduddin Owaisi said. The party would also demand that Urdu be made the first official language along with Telgu in Telangana and expressed hope that Urdu would continue to be second official language in other states.
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हिंदी की इस दशा के हम गवाह ही नहीं दोषी भी है !
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शादाब जफर ''शादाब''
आज हिंदी जिस बुरे दौर से गुजर रही है हम इस के गवाह भी है और गुनाहगार भी। हिंदी बोलने और पढने वालो को आज देश में अनपढ गंवार, मीड़िल क्लास या एकदम नीचे दर्ज का समझा जाता है। संसद हो या बडे बडे आयोजन हमारे देश के वो साहित्यकार जिन के कंधो पर हिंदी की जिम्मेदारी है हिंदी से विमुख होकर बड़ी शान से अंग्रेजी में अपना सम्बोधन देते है। उत्तर प्रदेश सहित देश की हिंदी अकादमिया में काम के नाम पर सियासी जाल बुने जा रहे कुछ में तथाकर्थित लोग हिंदी के नाम पर आपस में नूरा कुश्ती खेल रहे है। आज उत्तर प्रदेश के अलावा हिंदी देश में और कहा बोली जाती है, पंजाब में पंजाबी, हरियाणा में हरियाणवी, कष्मीर में कश्मीरी, गुजरात में गुजराती, बंगाल में बंगाली , महाराष्ट्र में मराठी, गढवाल में गढवाली, कर्नाटक में कर्नड़, चेन्नई में तमिल, हैदराबाद में हैदराबादी हर प्रदेश की अपनी अलग भाषा है दिल्ली में भाषा के नाम पर कोई एक भाषा नही बोली जाती दिल्ली में पंजाबी, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, भोजपुरी, बिहारी कई तरह की भाषाओ का इस्तेमाल होता है। असम में पिछले दिनो हिंदी भाषी लोगो के साथ जो मारपीट जुल्म किये गये उस से हम सब वाकिफ है। ये ही वजह है कि आज हिंदी सिर्फ और सिर्फ उत्तर प्रदेश की भाषा बन कर रह गई है।
बात अगर देश के अन्य प्रदेशो की जाये तो आज हिंदी को सब से बड़ा नुकसान इन अहिंदी भाषी प्रदेश ही पहॅुच रहा है इन प्रदेशो में कुछ लोग हिंदी के मठाधीश बने बैठे है। हिंदी की रोटिया खा रहे है हिंदी ही इन की सेवा कर रही है ये वो तथाकर्थित लोग है जो न कविता रचते है न गीत और न हिंदी साहित्य। पर फिर भी इन की गिनती देश के वरिष्ठ कवि, कहानीकारो, आलोचको, में तो होती ही है साथ ही इन के द्वारा कविता के नाम पर एक दो चुटकुले कवि सम्मेलनो में इन्हे बीस बीस, पच्चीस पच्चीस हजार रूपये और हिंदी संस्थानो से लाखो रूपये पुरूस्कारो के रूप में भी दिला देते है। जिस भारतेन्दू हरीश चंद्र ने कर्ज लेकर हिंदी की सेवा की वही आज हिंदी और हिंदी अकादमिया कर्ज लेकर इन तथाकर्थित साहित्यकारो, कवियो, और रचनाकारो की सेवाए कर रही है। यू तो देश के हर प्रदेश में एक हिंदी अकादमी हिंदी के उत्थान के लिये स्थापित है पर अहिंदी भाषी इन प्रदेषो में हिंदी का कितना उद्वार होता है हम सब जानते है हर साल लाखो रूपये खर्च करने के बाद भी हिंदी के साथ इन प्रदेशो में भाषा के नाम पर खुल्लम खुल्ला सौतेला व्यवहार होता है। कुछ प्रदेशो में तो ये हिंदी संस्थान राजनीति का अड्डा बने हुए है पिछले दिनो किस प्रकार दिल्ली की हिंदी अकादमी में साहित्यकारो के बीच द्वंद्व युद्व मचा था हम सब जानते है। उत्तर प्रदेष हिंदी संस्थान में पिछले कई सालो से हिंदी पुरूस्कारो की घोषणा नही हुई। आखिर ऐसे में हिंदी का किस प्रकार विकास हो। देश के कुछ हिंदी संस्थानो में हिंदी के विकास और पुरूस्कार के नाम पर आये पैसे का बंदरबाट हो जाता है। और केवल कागजो में ही हिंदी के नाम की दूध की नहरे बहाकर दिखा दी जाती है।
जिस देश की राष्ट्र भाषा हिंदी हो उस देश में केवल एक ही दिन हिंदी दिवस मनाने की प्रथा किस ने और क्यो चलाई। आज पूरे विश्व में बोली जाने वाली लगभग 7000 भाषाओ मे से लगभग 40 प्रतिशत भाषाए खतरे में में है जिन में हिंदी भी है। यू तो हम लोग 14 सिंतम्बर को बडे गर्व से साल में एक दिन हिंदी दिवस मनाते है, देश के बडे बडे साहित्यकार, पत्रकार, कवि, बुद्विजीवी, समाज चिंतक, रचनाकार, समाजसेवी संस्थाए आदि हिंदी को देश के माथे की बिंदी, अपनी भाषा, अपने पुरखो की भाषा, अपने देश की भाषा, आमजन की भाषा, राष्ट्रभाषा, कह कहकर गला सूखा लेते है पर साल के 364 दिन इन लोगो को हिंदी कभी याद नही आती। 2011 की जनसंख्या के अनुसार हमारे देश की जनसंख्या 121 करोड़ को पार कर गई जिन में हिंदी भाषियो की संख्या करीब सत्तर करोड़ बताई जा रही है। आश्चर्य होता है जिस देश में सत्तर करोड़ लोग हिंदी भाषी हो वहा हिंदी का ऐसा हाल।
पिछले वर्ष 26 सितंबर को भारत सरकार के राजभाषा विभाग की ओर से विभाग की सचिव महोदया ने एक पत्र जारी किया था जिस का विषय था ''सरकारी कामकाज में सरल और सहज हिंदी के प्रयोग के लिये नीति-निर्देश'' ये पत्र केंद्र सरकार के मंत्रालयो और विभागो के सचिवो को प्रेषित किया गया था। वैसे ऐसा पहली बार नही हुआ देश का राजभाषा विभाग समय समय पर जरूरत के हिसाब से न जाने कितनी बार ऐसे दिशा निर्देश जारी कर सरकारी विभागो को समय समय पर ये कहता रहा है कि सरकारी कामकाज की भाषा आसान होनी चाहिये परन्तु हिंदी की शुद्वता की चिंता, राजभाषा के मिटने की दुहाई देकर देष का एक बडा हिंदी प्रेमी वर्ग ऐसे राजभाषा विभाग के आदेशो का उपहास उड़ाने लग जाता है। देश के कुछ पत्रकार, साहित्यकार और इलैक्टोनिक्स मीडिया का एक बडा वर्ग भी इन के साथ हो जाता है। दरअसल आज देष में एक बहुत बडा वर्ग ऐसा है जो आसान हिंदी बोलता और समझता है जिसे कुछ लोग हिन्दुस्तानी भाषा भी कहते है और सरल हिंदी भाषा भी ये वो भाषा है जो कि सिनेमा, टीवी सीरियल, समाचार पत्र पत्रिकाओ और काफी अधिक संख्या में हमारे देश में लोग बोलते और समझते है।
में जब जब बालीवुड सुपर स्टार श्री अमिताब बच्चन जी को हिंदी में बोलते हुए देखता हॅू तो उन के द्वारा बोले जाने वाले हिंदी के एक एक शब्द को सुनकर मजा आने के साथ ही गर्व का अनुभव होता है। जब कि देश के कुछ बडे बडे पद्वम श्री और पद्वम भूषण व पद्वम विभूषण हिंदी के नाम की बरसो से रोटी खाने वाले और हिंदी के सहारे ही शौहरत की बुलंदी पर पहुॅचने वाले न जाने कितने ही लोगो को बहुत खास मौको पर भी अंग्रेजी में बोलते हुए देखता हॅू तो मन दुखी होता है। हिंदी फिल्मी गीतकारो ने जिस प्रकार हिंदी की सेवा की और साधारण और सरल भाषा में हिंदी गीत रचकर ये साबित कर के दिखाया की यदि सलीके से हिंदी गीतो को रचा जाये तो हिंदी गीत निसंदेह ऊर्दू शायरी में रचे गये गीतो की तरह ही लोगो के दिलो में उतर सकते है। गीतकार इंदीवर द्वारा रचे गीत ''कोई जब तुम्हारा ह्दय तोड़ दे'', शुद्व और आसान हिंदी भाषा में रचा सुन्दर गीत था तो वही ''चंदन सा बदन चचंल चितवन'' के अलावा ''दर्पण को देखा तूने जब जब किया श्रृंगार'' जैसे कर्णप्रिय हिंदी गीतो को तब से आज तक पसंद किया जाता रहा है। ये सब हिंदी और आम हिंदी भाषा का ही जादू था। गोपाल दास नीरज और संतोष आनंद जी के लिखे हिंदी के गीतो को फिल्म निर्माता हाथो हाथ लेने को तैयार रहते थें।
एक जमाने में कवि सम्मेलनो में हिंदी राज किया करती थी, देश के समाचार पत्रो में काम करने वाले लाखो कर्मचारी हिंदी वर्णमाला के एक एक शब्द को चुन चुनकर हर रोज़ हिंदी में छपने वाले समाचार पत्रो का किसी नव यौवना की तरह श्रृंगार किया करते थे। देश की आजादी के आन्दोलन के दौरान समाचार पत्रो और उन के मालिको, पत्रकारो की सीमाए सीमित थी, आय का कोई खास जरिया नही था। इस सब के बावजूद उस वक्त के रचनाकारो, पत्रकारो, साहित्यकारो और खुद समाचार पत्रो के मालिको को हिंदी के विकास की चिंताए रहती थी। ये सब लोग तन, मन, धन से हिंदी को परिनिष्ठित करने और उसे जन जन की भाषा बनाने, माजने में जुटे रहते थे। ये ही वजह थी की हिंदी उस वक्त समृद्व थी। पर आज हिंदी भाषा सिर्फ कागजी रिकॉर्ड में ही राजभाषा रह गई है या फिर कुछ लोगो के लिये हिंदी कमाई का धंधा मात्र बन कर रह गई है आज हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा है ये न तो संसद में साबित होता है न कवि सम्मेलनो और न हिंदी के अखबारो और न हिंदी के टीवी चैनलो सें।
· लेखक परिचय
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।
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Posted: 13 Sep 2012 04:55 AM PDT
बलबीर राणा "भैजी" राष्ट्रभाषा अपनी क्षीणतर हो चली हिन्दी का हिंग्लिस बन खिंचडी बन चली अपनो के ही ठोकर से अपने ही घर में पराई बनके रह गयी आज विदेशी भाषा अपने ही घर में घुस मालिकाना हक जता रही उसके प्यार में सब उसे सलाम बजा रहे यस नो वेलकम सी यू कहकर शिक्षित [...]
http://feedproxy.google.com/~r/pravakta/~3/Dk2xju0hkYM/the-plight-or-predicament-hindi?utm_source=feedburner&utm_medium=email
हिन्दी की दशा या दुर्दषा
राष्ट्रभाषा अपनी क्षीणतर हो चली
हिन्दी का हिंग्लिस बन खिंचडी बन चली
अपनो के ही ठोकर से
अपने ही घर में पराई बनके रह गयी
आज विदेशी भाषा अपने ही घर में घुस
मालिकाना हक जता रही
उसके प्यार में सब उसे सलाम बजा रहे
यस नो वेलकम सी यू कहकर
शिक्षित सभ्य होने की मातमपुर्षी बघार रहे
अंग्रेजी बोलने वाला कुलीन शिक्षित है
ना बोलने वाला गंवार अनपढ़
राष्ट्रनेता हिन्दुस्तान के
राष्ट्रभाषा के नाम पर ऊँचा भाषण
ऊँची योजना बनाते
नाक रखने के लिए कभी कभार
रोमन में लिखी भाषण कुंडली
हिन्दी में पढ लेते
नयीं पीढ़ी हिन्दी बोल तो लेते
पढ लिख नही सकते
नयीं पीढ़ी के आदर्श बने
खिलाडी चलचित्र सीतारे
हिंग्लिस की गिटपिट से
हिन्दी की रूप सज्जा करते फिरते
अब वो दिन दूर नहीं
संस्कृत की तरह हिन्दी भी
पूरी तरह उपेक्षित होने वाली है
ज्ञान विज्ञान के भण्डार ग्रन्थ
पुस्तकालयों के में
चिस्कटों के शूल से जीवन की आखरी साँसे गिनने वाले हैं
ग्रन्थो का विदेशी अनुवाद
अपभ्रंषक होकर और ही अर्थ समझाने वाले हैं
हिन्दी की दशा या दुर्दषा के लिए कौन जिम्मेवारी लें
तुम्हें क्या पडी रहती साहित्यकारो
हिन्दी की दुर्दषा पर लिखते रहते
राष्ट्रभाषा ठेकेदारों की तरह तुम भी
हिन्दी दिवस पर वार्षिक कर्म कांड कर लो
पितृ पक्ष के श्राद्ध की औपचाकिता निभा लो
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1. "When you call our country as India, you relate yourself to a history of few hundred years. When you call it Bharatvarsh/ Bharat, you relate yourself to a heritage that goes back to time immemorial. Learn to identify your country correctly to know yourself." - Manooj Rakhit
2. Ours is a nation of those who are Hindus plus those who were Hindus.
आज भी हमारी सरकार की सभी वेबसाइटे अंग्रेजी की शोभा बढ़ा रही है।
विकास कुमार गुप्ता
हमारा देश 15 अगस्त 1947 को आजाद – Swatantra हुआ। लेकिन हमारी जनता आजाद गुलाम की मानिंद जिन्दगी बसर करने मजबूर है। और यह सब हमारी सरकार की कुनीतियों एवं अनदेखी का परिणाम है। हमारे थाने अंग्रेजों के समय के थानों से भी खतरनाक है वो इसलिए क्योंकि अंग्रेजों की लाठी खाने पर कम से कम अपने लोगों की सहानुभूती और मदद तो मिलती थी। लेकिन वर्तमान में तो हमारे थानों में हमारे ही लोग है जो हुबहू अंग्रेजों जैसी ही लाठियां भांजते नजर आते है। क्योंकी इंडियन पुलिस एक्ट अभी भी वहीं का वहीं है। अगर कोई शासनतंत्र गुलामों पर शासन करने के लिये कोई कानून का निर्माण करता है तो हूबहू वहीं कानून आजाद लोगों पर कैसे लागू किया जा सकता है। सर्वविदित है कि नौकर और गुलाम के लिए कपड़े, खाने से लेकर हर विषय-वस्तु में फर्क होता है लेकिन हमारे बुद्धिजीवी नेताओं को आजादी मिलने पर यह बात समझ में नहीं आई। बेफिजूल के हजारों कानून देश में अभी भी लागू है किसलिए पता नहीं। किसी ने सही ही कहा था कि भारतीय अभी सत्ता संभालने के योग्य नही है। एक तो भारतीयों को इन तमाम यूरोपीय टाइप के कानूनों की आदत नहीं थी। और इसपर अंग्रेजी की नासमझी थी। पूर्व में हमारे यहां 565 जिले हुआ करते थे और वे सभी जिले एक राज्य के रूप में थे। इन जिलों का एक राजा होता था। राजा ही अपने जिले का प्रधानमंत्री, जज, डीएम सब होता था। जजमेन्ट भी मिनटों में हो जाता था। और भ्रष्टाचार और घोटाला होने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि राजा ही सर्वेसर्वा होता था। शिक्षा और अन्य सभी मुलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति राजा द्वारा की जाती थी। लेकिन सब राजा एक दूसरे के शत्रु हुआ करते थे। और यही शत्रुता का लाभ अंग्रेजों ने उठाया। जब थाॅमस रो और जहांगीर के बीच पहली संधी 1618 में हुयी तबसे लेकर 1857 तक अंग्रेज यहां के राजाओं से संधी करते गये। 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद यहां सीधे ब्रिटिश संसद का शासन हो गया। उसके बाद अंग्रेजों ने आयरिश पीनल कोड को उठाकर यहां हूबहू लागू कर दिया। फिर डीएम, एसपी, और थाने बनाये गये। और फिर अंग्रेजों ने अपने यहां चल रहे संसदीय लोकतंत्र प्रणाली जिसे महात्मा गंाधी बाझ और वेश्या कहते थे को लागू कर दिया। और फिर मार-काट लूट का चक्र चलता रहा। जोकि 1947 तक चली। अंग्रेजों ने भारत में उपलब्ध सोने का 95 फीसदी हिस्सा जब लूट लिया और जब उनको लगा की यहां अब कुछ लूटने को बचा नहीं तक अंग्रेज से चले गये। विचारणीय है कि हमारा देश सोने का चिडि़या हुआ करता था। सारे रोमन और समूचा विश्व हमारे यहां का बना कपड़ा, लोहा और अनेको वस्तुएं खरीदकर प्रयोग करता था। और बदले में यहां के व्यापारियों को सोना मिलता था। क्योंकि उस समय सोना का सिक्का ही मुद्रा हुआ करता था। हमारे पड़ोसी देश नेपाल को भी अंग्रेज गुलाम बना सकते थे लेकिन नेपाल में सिर्फ राजा के पास ही सोना था और जनता गरीब थी। लेकिन की जनता के पास सोने के विशाल भंडार हुआ करते थे। अंग्रेजों के जाने बाद होना तो ये चाहिये था कि हम अंग्रेजों के सभी तंत्र को समाप्त कर अपना नया तंत्र बनाते। नये कानून बनाते। लेकिन जैसे अंग्रेज छोड़कर गये थे। उस शासन व्यवस्था पर हमारे काले अंग्रेजों ने शासन शुरू कर दी। जोकि अभी तक चल रही है। थानो से लेकर कार्यालय तक लूट मची हुई है। जिसको जहां मौका मिल रहा वहीं लूट का अध्याय शुरू हो जाता है। अंग्रेजी की समझ बहुत कम भारतीयों को है। उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय से लेकर उच्च स्तर पर सभी कार्य अंग्रेजी में हो रहे है। देश आजाद तो हुआ 1947 में लेकिन कानून 1860 के ही चल रहे है। और हमारी सरकारे कहती है कानून अंग्रेजों का है तो क्या हुआ शासन तो भारतीयों का है। अगर शासन भारतीयों का है तो फिर भारतीयों को उनके अधिकार क्यों नहीं दिये जा रहे। हम मनमोहन, प्रणब मुखर्जी और अपने देश के सरकार के हर उस शख्स से पूछना चाहते है कि बताओं इंटरनेट पर सभी सरकारी वेबसाइटे, देश के सभी कानून, देश की सभी व्यवस्था हिन्दी, तमिल, तेलुगु बोलने वाले के लिए है या 6 करोड़ की जनंसख्या वाले ब्रिटेन के लिए। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर सभी की वेबसाइटे पहले अंग्रेजी में क्यो खुलती है? और उसमें उपलब्ध दो तिहाई सामग्रियां आखिर हमारे देश की आठवीं अनुसूची में उपलब्ध भाषाओं में आखिर क्यों नहीं है। क्या सरकार सिर्फ अंग्रेजी भाषियों के लिए है या अन्यों के लिए भी। सैकड़ों प्रकार के टैक्स और शुल्क हिन्दी और अन्य आठवी अनुसूची भाषी देते है तो फिर सबके साथ ये अन्याय क्यो?
क्यों जबरदस्ती हमारे देश के होनहारों पर अंग्रेजी थोपी जा रही है। अभी कुछ समय पहले एक आई.ए.एस से मेरी हिन्दी अंग्रेजी को लेकर चर्चा हो रही थी। ये आइएएस महोदय अंग्रेजी के तारिफों के पुल बांधे जा रहे थे। फिर मैंने अंग्रेजी की एक कविता उन्हें दी और कहा इसका अर्थ बताइयें फिर क्या था, वह आइ.ए.एस. महोदय बगले झांकने लगे। भाषा जानना और उसकी आत्मा को समझना दो अलग पहलु है। हिन्दी हमारी आत्मा में बसती है। लेकिन अंग्रेजी को हम अनुवाद करके ही समझते है। हां अगर 1 अरब 25 करोण में एक से डेढ़ करोण लोग अच्छी अंग्रेजी वाले है भी तो उनकी वजह से 1 अरब 24 करोण लोगों पर अंग्रेजी थोपना प्रजातंत्र के सिद्धान्त के अनुसार क्या न्यायोचित माना जायेगा? जब देश के सबसे कठिन परीक्षा पास करने वाले अधिकारियों का ये हाल है तो फिर आम जनता की स्थिति का आंकलन स्वतः किया जा सकता है। आज भी सरकारी कार्यालयों में इतने नियम है कि उन्हें समझने के लिए सालों लग जाते है। भाषा के चलते आ रहे समस्याओं के समाधान हेतु राजभाषा नियम 1976 बनाया गया था लेकिन इसका समुचित अनुपालन आज तक नहीं हो पा रहा। आज भी हमारी सरकार की सभी वेबसाइटे अंग्रेजी की शोभा बढ़ा रही है। आखिर आम जनता अंग्रेजी को क्यो पढ़े। भाषा की समस्या ही मुख्य समस्या है इस देश में। देश में क्या हो रहा है उसकी समझ आम जनता के परे है। सब रट्टा मार प्रतियोगिता करने में भागे जा रहे हैं। हमारे बगल में चाइना दिन-दूनी रात चैगूनी कर रहा है और वहां सभी कार्य उसके अपने भाषा में हो रहे है। जापान निरन्तर उन्नती कर रहा है और उसके यहां भी सभी कार्य उसके अपने भाषा में हो रहे है और भी अनेको देश है जो निज भाषा का प्रयोग कर उन्नती की अग्रसर है। लेकिन हमारी सरकार का अंग्रेजी मोह नहीं छुट रहा। हमारे देश के होनहार बच्चों को अंग्रेजी की चक्की में पीसा जा रहा है। एक तरफ संभ्रान्त, रसूखदार और ऊँचे तबके के लोग शुरू से ही अपने बच्चों को अंग्रेजी शिक्षा की चक्की का आंटा खिला रहे है तो दूसरी तरफ हमारी केन्द्र सरकार संविधान की दुहाई देकर प्राथमिक स्तर तक बच्चों को अंग्रेजी नहीं पढ़ा रही। क्योंकि हमारे संविधान का अनुच्छेद 350 (क) में प्राविधान है कि- "प्रत्येक राज्य और राज्य के भीतर प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के बालको को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्थाा करने का प्रयास करेगा।"
संविधान के अनुच्छेद 351 में हिन्दी भाषा के विकास के लिए निदेश दिये गये है और कहा गया है कि "संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिन्दी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए और जहां आवश्यक या वांछनीय हो वहां उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।" लेकिन सीधा प्राविधान होने के बाद भी हमारी सरकारे आज तक अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति की जगह अंग्रेजी भाषा की उन्नती करती जा रही है। और ऐसा सिर्फ सरकारी मांग की वजह से हो रहा है। क्योंकि हमारी सरकार और उनके द्वारा बुलायी गयी हजारों बहुराष्ट्रीय कंपनीय अंग्रेजी के जानकारों को खोज रही है। अतः हमारी जनता भी अंग्रेजी के पीछे दीवाना हो चुकी है। अगर आजादी पश्चात् ही आठवी अनुसूची की भाषाओं में ही कार्य किया जाता तो ऐसी स्थिति नहीं उभरती। समूचे देश की एक भाषा अगर चुनना ही था तो हिन्दी चुन ली जाती। और अगर अन्य आठवी अनुसूची से सम्बन्धित भाषाओं का विवाद उत्पन्न होता तो तमिल को अंग्रेजी की जगह तमिल हिन्दी दी जाती। राज्यस्तर की भाषा का चयन राज्य की भाषा के अनुसार किया जाता तो कितना अच्छा रहता।
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