Sunday, March 16, 2014

मोदी, संघ और बनारस

मोदी, संघ और बनारस

 

सदियों की "ब्राह्मणवादी मानसिक गुलामी का प्रतीक चिन्ह बनारस" शूद्रों, दलितों-आदिवासियों के लिए पवित्र नहीं, बल्कि पाखंडियों की नगरी है. एक देशी कहावत है, "शूद्रों को ठगने का लाल-पत्रा". संघ मोदी को झुनझुना बजाने के लिए बनारस ला चुका है. बहुत कठिन लेकिन शूद्रों के लिए परीक्षा की घड़ी है. ब्राह्मणवाद का पोषक 'पाखंडी नरेंद्र मोदी' को हराने का एकमात्र सीधा मतलब यही है "शूद्रों का मानसिक गुलामी से मुक्ति."

 

तीन महीने तक लगातार गुजरात में मासूम निर्दोष इंसानों और इंसानियत का कत्लेआम करने वाला इस दंगाई शख्स ने भारतीय फ़ौज को दंगाई इलाके में जाने से ही रोक दिया था. चुनाव आयोग को ऐसे कातिल को पहले ही अयोग्य घोषित कर देना चाहिए था. हमारा संविधान, क़ानून भी "धर्म जाति" के आधार पर जनता की भावनाओं को भड़काने और उसके नाम पर जनता का शोषण करने की इजाजत नहीं देता.

 

बनारस हो या हरिद्वार आम जनता को इससे क्या फर्क पड़ता है? जनता को यह अधिकार हो कि चुनाव बाद अगर वायदे के मुताबिक़ काम नहीं हुए...अगर एक भी शख्स भूखा-नंगा, भिखारी, गरीब, बेरोजगार नौजवान दिखे तो वह अपने जन-प्रतिनिधि को बुलाकर उसकी खाल उधेड़ ले.

 

1990 के बाद से ही वाराणसी में फिरकापरस्त भाजपा के सांसद रहे हैं. लेकिन नगर का कोई विकास हुआ है और ही देश या विदेश में इसकी धर्म-निरपेक्ष छवि बन पाई है. यहाँ के लोगों में आज एक छटपटाहट है, एक बेचैनी है.

 

इसमें दो मत नहीं है कि संघ-बीजेपी का नेटवर्क दूसरी पार्टियों की तुलना में अधिक मजबूत है. पिछले 40 सालों से यहाँ केवल धार्मिक और जातीय आधार पर ध्रुवीकरण होता आया है. इसी को ध्यान में रखते हुए मोदी ने बनारस से लड़ने का फैसला किया है. साहित्य्कार काशीनाथ सिंह का दावा है कि इस बार बनारस के लोग "धर्म और जाति" को ठेंगा दिखाएँगे. जहाँ तक ध्रुवीकरण का सवाल है...तो नरेंद्र मोदी की वजह से ही पूरे देश में ये आशंका जताई जा रही है कि "साम्प्रदायिक-ध्रुवीकरण का केंद्र बिंदु बनारस" मोदी के लिए रास्ते का रोड़ा भी बन सकता है, बशर्ते कि धर्म-निरपेक्ष शक्तियों का ध्रुवीकरण शुरू हो.

 

सांप्रदायिक-फासीवाद विरोधी जन मंच

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