Monday, June 16, 2014

Re: माकपा की दुर्गति

माकपा के पतन का यह विश्‍लेषण अनुभववादी है। यह बीमारी के लक्षणों का विवरण है। सही मार्क्‍सवादी विश्‍लेषण विचारधारात्‍मक अवस्थिति से प्रस्‍थान करता है। माकपा अपने जन्‍मकाल से ही एक मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी पार्टी नहीं थी। भाकपा के लिजलिजे संशोधनवाद के बरक्‍स इसने रैडिकल चेहरे वाले नवसंशोधनवाद के जरिए मज़दूर वर्ग और क्रांतिकारी कतारों को ठगने का काम किया। 'महान बहस' में इस पार्टी ने ख्रुश्‍चोवी संशोधनवाद की आलोचनाओं के बजाय मध्‍य मार्ग अपनाया था। चीन की महान सर्वहारा सांस्‍कृतिक क्रांति की आलोचना करते हुए इसने गद्दार ल्‍यू शाओ ची के उत्‍पादक शक्तियों के विकास के सिद्धांत की तरफदारी की थी और 1976 से लेकर अबतक चीनी ''बाजार समाजवाद'' के देंगपंथी रास्‍ते का पुरजोर समर्थन करती रही है। इसके अबतक के आचरण से यह स्‍पष्‍ट हो चुका है कि यह बुर्जुआ संसदीय चुनावों और संसद का 'टैक्टिक्‍स' के रूप में इस्‍तेमाल नहीं करती, बल्कि रणनीति के रूप में इस्‍तेमाल करने वाली संसदीय जड़वामन पार्टी है। ट्रेडयूनियन के मोर्चे पर यह पार्टी लेनिनवादी नीतियों के बजाय ट्रेडयूनियनवाद और अर्थवाद की कवायद करती है। इस पार्टी का ढाँचा शुरू से ही लेनिनवादी नहीं, बल्कि काउत्‍स्‍कीपंथी और ख्रुश्‍चोवी रहा है। माकपा लेनिन-स्‍तालिन-माओ की नहीं, बल्कि काउत्‍स्‍की-ब्राउडर-टीटो-ख्रुश्‍चोव-ल्‍यू शाओ ची-देंग सि‍याओ-पिंग की अनुगामिनी पार्टी है। आज यह पार्टी ''मानवीय चेहरे वाले'' नवउदारवाद और कल्‍याणकारी बुर्जुआ राज्‍य से आगे कुछ भी नहीं सोचती और पतित होते-होते यूरोप की लेबर पार्टियों जैसी ही सामाजिक जनवादी पार्टी तथा इस व्‍यवस्‍था की विश्‍वसनीय दूसरी सुरक्षा पंक्ति बन चुकी है। मज़दूर वर्ग को अर्थवाद के चंगुल में फँसाकर इस पार्टी ने उसे फासीवाद-विरोधी संघर्ष की तैयारी से विमुख कर देने का ऐतिहासिक अपराध किया है और फासीवाद विरोध को केवल चुनावी हार-जीत तथा रस्‍मी बौद्धिक कवायदों तक सीमित कर दिया। इस मायने में भी इसकी भूमिका वैसी ही है, जैसी गत सदी के तीसरे-चौथे दशक में यूरोपीय सामाजिक जनवादी पार्टियों की थी। सत्‍ता भोगते-भोगते पतित होकर इस पार्टी का आचरण पश्चिम बंगाल में सोशल फासिस्‍टों जैसा हो गया था, जिसका लाभ तृणमूल कांग्रेस को मिला और अब भाजपा को मिल रहा है।
नक्‍सलबाड़ी किसान उभार से पैदा हुई मा-ले धारा ने माकपा के संशोधनवाद की सही आलोचना की, पर अपनी खुद की विचारधारात्‍मक कमजोरियों, ''वाम'' दुस्‍साहसवाद के प्रभाव और कार्यक्रम के प्रश्‍न पर यांत्रिक, कठमुल्‍लावादी, अंधानुकरणवादी सोच के चलते यह धारा भी गतिरुद्ध होकर बिखर गयी। इसके कुछ घटक आज भी ''वाम'' दुस्‍साहसवादी लाइन लागू कर रहे हैं और कुछ संशोधनवाद की ढलान पर हैं। एक ऐसी बोल्‍शेविक साँचे-खाँचे वाली लेनिनवादी पार्टी का पुनर्निर्माण और पुनर्गठन कम्‍युनिस्‍ट क्रांतिकारियों की वर्तमान पीढ़ी का सर्वोपरि कार्यभार है, जो भारत के उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों में आये बदलावों को, पूँजीवादी विकास को और साम्राज्‍यवाद के ढाँचे और कार्यप्रणाली में आये बदलावों को समझकर भारतीय क्रांति की ऐतिहासिक यात्रा को फिर से आगे की ओर गति दे सके।
By Kavita Krishnapallavi



2014-06-17 10:51 GMT+05:30 Akhilesh Chandra Prabhakar <acpjnu@gmail.com>:

 

 

माकपा की दुर्गति

 

हालांकि, पिछले हफ्ते माकपा की सर्वोच्च कमिटी (पोलित-ब्यूरो और केंद्रीय कमिटी) ने अपनी बैठक में सोलहवें लोकसभा चुनाव में माकपा के पराजय के लिए सामूहिक जिम्मेवारी लेते हुए  उसके कारणों की गहन पड़ताल करने तथा इसी के साथ माकपा की नयी राजनीतिक लाईन तय करने के लिए ठोस राजनीतिक परिस्थितियों का अध्ययन करने का भी निर्णय किया है. जाहिर है, माकपा वामपंथ से जुड़ा हुआ हर गंभीर राजनीतिक शख्स इन दिनों देश में "प्रति-क्रान्ति" की ताकतों के उभार को लेकर बेहद चिंतित है. इनमे से कुछ तो राजनीतिक अवसाद के भी शिकार हुआ बताये जाते है. बहरहाल, मार्क्सवाद-लेनिनवाद की शिक्षा हमें जनता में अटूट भरोसा रखने तथा जनता के बीच रहकर लगातार क्रांतिकारी चेतना विकसित करते रहने की प्रेरणा देता है. अंतर-राष्ट्रीय सर्वहारा के महान पथ-प्रदर्शक लेनिन से लेकर पी सुन्दरैय्या तक ने जनतारूपी समुन्द्र में कम्युनिष्टों को मछली की तरह हमेशा तैरते रहने को कहा था.    

 

फेसबुक पर कल प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी (कलकत्ता विश्वविद्यालय हिंदी विभाग) के आलेख: 'मार्क्सवाद की दुखती रग' जिसमे माकपा के पश्चिम बंगाल इकाई के सांगठनिक क्रिया-कलापों पर सवाल खड़ा करते हुए बड़े नेताओं के प्रति जनता में घृणा होने से लेकर माकपा के स्थानीय स्तर पर अपराधियों का बोलबाला होने तक का जिक्र किया गया है, उसे पढ़ने के बाद उस पर टिपण्णी करना अनिवार्य समझा. हालांकि, भारत का कोई भी राजनीतिक दल इस समय यह दावा नहीं कर सकता की वे सौ फीसदी "दूध के धुले" हुए है. हालिया आम चुनाव के बाद जो सांसद चुनकर लोकसभा में आये है उनमे से १८२ सांसदों के ऊपर संगीन किस्म के आपराधिक मामले न्यायालयों में पहले से ही लंबित चला रहा है, इनमे से अधिकांशतः भाजपा के ही ९८ सांसद बताये जाते है. मतलब यह की 'संसद अपराधियों से लबालब' भरा हुआ है.

 

पश्चिम बंगाल में माकपा ने अनेकों मौके पर संगठन के अंदर अपराधियों के घुसपैठ पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की है. जहां तक मुझे याद है, माकपा ने आज से लगभग २०-२५ साल पहले एक ही झटके में तकरीबन ३०००० लोगों को संगठन से बाहर खदेड़ दिया था. बहरहाल, इसके बाबजूद; माकपा के ही वरिष्ठ नेता और ज्योति बसु  सरकार में के तात्कालीन भूमि-सुधार मंत्री का. बिनय कृष्ण चौधरी ने बहुत गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था... "ज्योति बसु की सरकार माफिया के द्वारा; माफिया के लिए, माफिया की सरकार है". इस तरह के गंभीर आरोप कभी भी विरोधी दल कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस ने भी नहीं लगाया था. बाद में त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री और पोलित-ब्यूरो सदस्य का. नृपेन चक्रवर्ती ने भी ज्योति बसु पर हमला करते हुए कुल छह आरोप तय किये थे. मैं उस समय दिल्ली में जेएनयू के एसऍफ़आई और माकपा इकाई से जुड़ा था और इस नाते मैंने का. सुरजीत को पत्र लिखकर माकपा से नृपेन चक्रवर्ती के निष्कासन पर अपना विरोध दर्ज कराया था.  

 

पश्चिम बंगाल में माकपा के संकट का कारण संगठन में अपराधियों की वजह नहीं बल्कि लगातार ३५ वर्षों तक सत्ता में रहने के बाबजूद; ज्योति बसु और उसके विरासत को संभालने वाला बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार के (शुरूआती भूमि-सुधार, पंचायती राज में महिलाओं की भागीदारी, बक्रेश्वर विद्युतीकरण परियोजना के अलावा), कोई ठोस "वैकल्पिक मॉडल" पेश करने तथा उत्पादक- शक्तियों का विकास करने में ही नाकामी में छिपा हुआ है जिससे आम जनता में माकपा के प्रति निराशा पैदा हुई है. माकपा नेतृत्व में ज्योति बसु से आँख में आँख डालकर बात करने की किसी अन्य नेताओं में हिम्मत नहीं थी जो उनके कुतर्क...'वर्गीय शक्ति-संतुलन को राष्ट्रीय स्तर पर बदले बिना राज्य-स्तर पर ज्यादा कुछ करना नामुमकिन सा है,' पर आत्म-विश्वास के साथ बहस कर सके. का. .एम.एस. नम्बूदिरीपाद ने जेएनयू में प्रोफेसर केएन पन्निककर द्वारा; आयोजित पीएन जोशी मेमोरियल लेक्चर के दौरान एक छात्र के सवाल का जवाब देते हुए कहा था की "यह कहना बहुत कठिन है मेरे लिए की पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु सरकार की क्या-क्या उपलब्धियां रही है." हाँ, आप चाहे तो इसे अन्य राज्यों के साथ तुलना कर सकते है.

 

जहां तक माकपा के 'विचारधारात्मक राजनैतिक' प्रश्नों का सवाल है...'वास्तव में सोवियत पराभव के बाद से ही सांगठनिक जनता के स्तर तक अभियान चलाने में जबरदस्त किस्म की सुस्ती छायी हुई है. सोवियत समाजवादी शिविर ढहने के बाद  माकपा ने अपनी सारी ताकत पार्टी सदस्यों को समेटने में  लगाया था. इस दौरान राष्ट्रिय, अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर कई राजनीतिक घटनाक्रम सामने आये. माकपा ने लगातार संघर्ष भी किया है, और पिछले दो सालों में खासकर ऐसा शायद ही कोई महीना खाली रहा हो जिसमे माकपा ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक कार्यक्रम का ऐलान किया हो!  इसलिए प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी द्वारा उठाये गए सवाल जिसमे संगठन के अंदर भद्र-अभद्र जनो के बीच फर्क करने पर जोर दिया गया है असरदार नहीं है. वैसे राजनीतिक दल जो संसदीय जनतंत्र में शामिल होकर चुनाव के जरिये सत्ता में आना चाहती है उन्हें ऐसा करना तब और मुश्किल हो जाता है जब प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों से शारीरिक मुकाबले का खतरा हो.

 

. सी. प्रभाकर

वाम-जनवादी विचार मंच 




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