Saturday, December 27, 2014

महान विश्वगुरू भारतीय दार्शनिक 'चार्वाक' को 'भारत-रत्न' से सम्मानित करो !

 

 

महान विश्वगुरू भारतीय दार्शनिक 'चार्वाक' को 'भारत-रत्न' से सम्मानित करो !

 

बड़े अफ़सोस की बात है कि जिस दिन 81 से भी ज्यादा आदिवासी बच्चों-महिलाओं की निर्मम हत्या की जा रही थी और सत्तर हजार से भी अधिक आदिवासी असम के कोकराझार से पलायन कर पश्चिम बंगाल पनाह लेने को मजबूर हो रहे थे...ठीक उसी दिन हमारे देश का प्रमुख चौकीदार अपनी चौकीदारी ड्यूटी छोड़कर बनारस में श्री अटलबिहारी वाजपेयी का जन्म-दिवस मनाते हुए उन्हें 'भारत-रत्न' का  तोहफा भेंट कर रहा था. भारत की सभ्य जमात मोदी सरकार से इसका तलब करना चाहेगा कि आखिर क्या वजह है कि, जब किसी अदना सा भ्रष्ट, जातिवादी/सांप्रदायिक नेताजी की स्वाभाविक मृत्य पर भी 'राष्ट्रीय/राजकीय शोक' की घोषणा कर दी जाती है...फिर दर्जनों बेक़सूर आदिवासियों के नरसंहार पर आजतक सरकारी महकमा में और मीडिया में अबतक कोई खलबली क्यों नहीं मची? . 

 

भारत-रत्न के तोहफे से उस वाजपेयी को नवाजा गया जिसके बारे में पहले से ही जगजाहिर था कि श्री अटलबिहारी वाजपेयी सोलह साल के उम्र में ब्रिटिश सरकार के लखनऊ बेंच के सामने लिखित माफीनामा देकर सत्याग्रही आंदोलनकारी के खिलाफ मुखबिर बने/ सरकारी गवाह बने थे. श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी का दूसरा सबसे बड़ा योगदान यह कहा जा सकता है कि 'गुजरात २००२ नरसंहार के समय तीन महीने तक मूकदर्शक बने रहने के बाद उन्होने मोदी को "राजधर्म" का पालन करने का आग्रह किया. बाद में मोदी द्वारा; "राजधर्म" का पालन किये जाने के विरोध में सीधे मनाली अपने होटल पहुंचकर कुछ कविताएँ लिख डाला. श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी की तीसरी उपलब्धि थी उनके शासनकाल में तीन महीना तक चले "कारगिल-युद्ध" और उसके बाद संसद पर हमले के जिम्मेदार आतंकवादियों को संसद भवन परिसर में ही मार गिराना...

 

भारत-रत्न का दूसरा हकदार बने श्री मदन मोहन मालवीय जी जिनके बारे में कहा जाता है कि बनारस का 'शूद्र, गंवार, पशु नारी' को एक ही डंडे से पीटने वाले युरेशियन षंडयंत्रकारी दकियानूसी बाभन 'तुलसीदास का सभ्य प्रसंस्करित रूप श्री मदन मोहन मालवीय जी 'घृणित जातिवादी विचारधारा' को 'शैक्षिक-संस्थागत रूप' प्रदान करने के उद्देश्य से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया था. ऐसे शख्सियत को राष्ट्रीय सम्मान देकर मोदी सरकार ने वास्तव में अपने "ब्राह्मणवादी-चरित्र" को निर्लज्ज/नंगई तरीके से उजागर किया है.  

'भारत-रत्न' अगर देना ही है तो महान भारतीय दार्शनिक 'चार्वाक' को 'भारत-रत्न' से सम्मानित करो जिसने "द्वंद्धात्मक-भौतिकवादी हीगेल और मार्क्स" से भी बहुत पहले "भौतिकवादी सिद्दांत" प्रतिपादित कर भारत को दुनिया का विश्वगुरू बना दिया था. ऐसे महान दार्शनिक 'चार्वाक' ही वास्तविक हकदार है 'भारत-रत्न' के लिए...

 

मगर, हम जानते है कि 'भारत-रत्न' बांटने के पीछे जो तुम्हारी असली मंशा है वह है...'वैश्विक-मंदी के गिरफ्त में अधिक से अधिक फंसती चली जा रही "पूंजीवादी व्यवस्था" को भारतीय सर्वहारा वर्ग से अल्पकालीन -दीर्घकालीन सीधी कोई चुनौती मिले, और पूंजीपतियों के मुनाफे बेरोक-टोक जारी रहे...इसके लिए भारतीय शासकवर्ग 'सरमायेदारों-पूंजीपतियों' ने दकियानूसी आरएसएस सरीखे  "ब्राह्मणवादी हिन्दू साम्प्रदायिकता" का दामन थाम लिया है...ताकि,  'सरमायेदारों-पूंजीपतियों' के खिलाफ लाखों-करोड़ों शोषित-पीड़ित मेहनतकश-मजदूरवर्ग के जनांदोलन को साम्प्रदायिक बंदरों के ''लव-जेहाद, धर्मांतरण, तो कभी दुसरे धर्म से बहू लाओ, बेटी बचाओ अभियान चलाकर ब्राह्मणवादी दकियानूसी हरकतों में फंसाकर रखा जा सके.

 

बहरहाल, जिस तरह १९३० की वैश्विक मंदी के कोख से 'नात्सी फासीवादी हिटलरी तानाशाही' ने जन्म लिया और जिसने दुनिया पर जबरन द्वितीय विश्व युद्ध थोपकर तीन करोड़ लोगों को लील लिया था...आखिर उसी वैश्विक मंदी के कोख से 'फासीवादी हिटलरी तानाशाही' को परास्त करते हुए 'सर्वहारा मजदूरवर्ग ने माओत्सेतुंग के नेतृत्व में 'सर्वहारा-क्रान्ति' का विजय पताका भी फहराया था चीन में.

 

आज एकबार फिर जब 'वैश्विक पूंजीवादी मंदी' का दौर चल रहा है तो जाहिर है, पूंजीपतिवर्ग ने अपने वही पुराने अंदाज में भारतीय नमूने का घृणित सांप्रदायिक-फासीवादी  'मोदीनुमा तानाशाही' को चुना है. उधर कई देशों में साम्राज्य्वादी युद्ध भी बदस्तूर जारी है...जाहिर है, 'भारतीय सर्वहारा-क्रान्ति' भी तब दस्तक देने को तैयार बैठा है.

 

राम सिंह मेमोरियल ट्रस्ट (रसमत)

 

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