सोचा था क्या, क्या हो गया, क्या हो.......गया...!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ की (जब जे पी जीवित थे, उस समय भारतीय जनसंघ, भा ज पा नहीं बनी थी.) हिंदुत्व की जो कल्पना है, उसका मैं हंमेशा ही आलोचक रहा हूँ. पाकिस्ताना के साथ संबंध सुधारने की मेरी हर कोशिश का इन लोगों ने जबरदस्त विरोध किया है. मेरे खिलाफ जुलुस निकालें हैं, सूत्रोच्चार किये हैं, मुझे यहाँतक कि गद्दार भी कहा है. कट्टरता और संकीर्णता को ही इन लोगों ने अपनी ताकद मानी है. गांधीजी के प्रति इन लोगों को नहींवत् ही इज्जत है.
यह सब मैं तो जानता ही था. और फिर भी मेरे संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में उनको सहभागी कर के मैं ने उन्हें "डी-कम्यूनलाईझ" याने कि कौमवाद से मुक्त करने की कोशिश की. सेक्युलरिझम् - बिन-साम्प्रदायिकता - की बुनियाद को मजबूत करने की मेरी टेक (संकल्प) थी. मुझे लग रहा था कि अटलजी में संकीर्ण पार्टी-हित के ऊपर ऊठने की क्षमता है. कितने उठ सकेंगे और पार्टी को साथ ले चल सकेंगे, यह तो मैं नहीं कह सकता.
- जयप्रकाश नारायण - भूमिपुत्र से, जे पी शताब्दी विशेषांक.
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सर्वादय आंदोलन के 1974-77 के समय में जो कार्यकर्ता संघर्ष में लगे थे उन्हें विनोबाजी ने एक अमूल्य संदेश दिया था, जो सब को आज भी उतनाही जीवन में उतारने के योग्य हैः " सत्य, अहिंसा और संयम "
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