बाभनवादी असाध्य मस्तिष्क-ज्वर से पीड़ित व्यक्तियों के इलाज के लिए ईबोला जैसा टीका लगाने हेतु राष्ट्रीय-अभियान छेड़ो!
जेएनयु में गुरूजी गिरिजेश पंत और एस डी मुनि ने 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग' से पचास लाख रूपये की परियोजना हासिल कर जिस काम को पूरा किया था...उसी काम को मैंने बगैर किसी प्रकार की आर्थिक सहायता लिए ही पूरा किया. कृपया; नीचे लिखे विवरण अवश्य पढ़े.
I had presented a paper on "Regional Energy Security Cooperation and Geo-politics," two days conference inaugurated by our former petroleum and gas minister Mr. Mani Shankar Ayer, and Chaired by Mr. Hamid Ansari (Vice-President of India), organized by Association of Indian Diplomats at India International Centre ( IIC), New Delhi on March 10, 2005.
The paper entitled: Regional energy security cooperation and geo-politics with specific references to India, published by (Leiden based) BRILL's African and Asian Studies. Volume 4, Issue 3, 1 September 2005, Pages 357-402 [SCOPUS Indexed]. And,
Second paper on India's Energy Security of Supply and the Gulf, published by SAGE's India Quarterly, Vol. LX. No.3. July-September, 2004, New Delhi [Indian Council of World Affairs (ICWA)].
मैंने शोध-छात्रवृत्ति के लिए इनसे सिर्फ आठ हजार रूपये महीने का मेहनताना माँगा था जिसे खारिज कर दिया गया. ऊर्जा सुरक्षा पर मेरे 'शोध-आलेख' को जेएनयु के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज से प्रकाशित होने वाले जर्नल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज ने तब प्रकाशित करने से मना कर दिया था क्योंकि यहाँ भी गुरूजी गिरिजेश पंत और एस डी मुनि उस जर्नल के सम्पादकीय सदस्य हुआ करते थे. अलबत्ता, उसी आलेख को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रिय और राष्ट्रीय जर्नल ने बाद में प्रकाशित किया.
दिल्ली विश्वविद्यालय के बिशेषज्ञों द्वारा; मेरे 'पीएचडी थीसिस रिपोर्ट' भेजे जाने के बाबजूद; सालभर से अधिक समय लग गए पीएचडी डिग्री निर्गत करने में...आपको बताते चलें की मैंने अपनी थीसिस को उत्तरी अफ्रीका के देश कीनिया जाकर लिखा है. जबकि, मेरे साथ ही पीएचडी थीसिस जमा करने वाले मेरे एक मित्र (जो तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुरक्षा गॉर्ड का भाई हुआ करता था) का 'पीएचडी थीसिस रिपोर्ट' महज ग्यारह दिनों के अंदर ही मंगा लिया गया और तेरहवें दिन उसे पीएचडी डिग्री निर्गत कर दी गयी, जो आज उसी जेएनयु में सहायक प्रोफेसर पद पर कार्यरत है. आप समझ सकते है कि वह कौन हो सकता है?
गुरूजी गिरिजेश पंत जब दून विश्वविद्यालय के कुलपति बने तब इथियोपिया से मुझे २०११ के १७ जून को साक्षात्कार के लिए दून विश्वविद्यालय बुलाया था. वहाँ भी मुझे खारिज किया गया. हालांकि, तबतक मैं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के अंतर्गत; इथियोपिया में छह साल पढ़ाने का अनुभव प्राप्त कर चुका था. अलबत्ता, जहां एक तरफ, दून विश्वविद्यालय द्वारा मैं खारिज किया जा रहा था... वहीँ दूसरी तरफ, मेरे 'शोध व शिक्षण कार्यों' को देखते हुए उसी देहरादून में स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज द्वारा; मुझे ऑफर भेजा जा रहा था.
यह सिलसिला एकबार फिर २०१४ में भी दोहराया गया जब जेएनयु के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज का डीन बने गुरूजी गिरिजेश पंत ने 'अफ्रीकन-स्टडीज केंद्र' में सहायक प्रोफेसर पद के लिए जेएनयु कुलपति के दबाव में मुझे साक्षात्कार के लिए आमंत्रित तो किया...बहरहाल, यहां भी मुझे 'अयोग्य' घोषित करने के एक लाख बहाने ढूंढ लिए, यह जानते हुए भी की मैं मलेशिया में पिछले तीन सालों से लगातार पढ़ाने और शोध कार्यों में बखूबी अपना योगदान देता चला आ रहा हूँ...
बहरहाल, खारिज होना अब हमारी नियति नहीं रही. भारत से 'बाभनवाद' को मिटाने के लिए मैंने भी अब कमर कस लिया है. "असाध्य रोग बन चुके "बाभनवादी मस्तिष्क-ज्वर" से पीड़ित कम्बख्तों के इलाज के लिए ईबोला जैसा टीका लगाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर खुला अभियान छेड़ने के जज्बे के साथ मेरे जेएनयू के मेरे कटु अनुभव ही मेरे 'ऊर्जा का मुख्य श्रोत' बन गया है.
सड़ांध बाभनवाद के खिलाफ जंग छेड़ो!
ए. सी. प्रभाकर
Dr. A.C.Prabhakar
Senior Lecturer
Associate Editor of International Journal of Asian Social Sciences
Department of Economics
School of Economics, Finance & Banking
College of Business
Universiti Utara Malaysia
06010 Sintok, Kedah Darul Aman
Malaysia
Phone: +60-175221803 (Mobile)
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