विज्ञान कांग्रेस में जुटे लोग वैज्ञानिक या हास्य कलाकार ?
जहां तक हंसने-हंसाने के लिए चुटकुलेबाजी करने का सवाल है इससे किसी को भला क्या आपत्ति हो सकती है. लेकिन, लाखों-करोड़ों रूपये खर्च कर 'विज्ञान कांग्रेस' में गंभीर बहस- मुबाहिसे के लिए जुटे हमारे जाने-माने वैज्ञानिकों के बीच आयोजित समारोह में कोई हास्य, व्यंग, चुटकुले करने की गुस्ताखी करे तो मामला वाकई गंभीर समझा जाना चाहिए. दुनिया आज भारत में आयोजित विज्ञान कांग्रेस का मजाक उड़ा रही है. सात हजार साल पहले साइकिल बनाने की इनकी औकात नहीं थी और विज्ञान कांग्रेस में बैठे लोग 'रिवर्स गियर वाला विमान' से लेकर 'परमाणु बम' तक बैठे-बैठे ही महज चंद मिनटों ही बना लिए...वो भी "संस्कृत-भाषा" की मदद से.
इन कम्बख्तों ने कथितरूप से रावण (जिसे अब चांडाल सुब्रह्मण्यम स्वामी 'रावण' को उत्तर-प्रदेश का दलित बता रहा है), द्वारा; अपहृत सीता को भी लंका से इसी रिवर्स गियर वाला गुजरात निर्मित विमान से अयोध्या ले आये थे, ऐसा दावा किया जा रहा है.
उधर महर्षि दीनानाथ बत्रा के खानदान के लोगो ने "समुद्र-मंथन" से प्राप्त केरोसीन की सप्लाई का ठेका असुरो को युद्ध में हराकर प्राप्त किया था, यह भी कथित आर्य-पुत्र का दावा है. आजकल आतंकी संघ प्रमुख मोहन भागवत की भी बड़ी-बड़ी मूंछे निकल आयी है जो दिन-रात "आर्य-भारत" के कसीदे पढ़ने में मशगूल दिखाई देते है. मतलब साफ़ है "विदेशी ईरानियन-युरेशियन आर्य-बरहमन" हिन्दू जो सिंधु (नदी) निवासी थे, जिसने मूलनिवासी (बनारस के षड्यंत्रकारी तुलसी द्वारा; कृत्रिम जातिभेद पर आधारित- आज के 'आदिवासी-दलित-पिछड़े शूद्रों') को सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से पिछले बाईस सौ सालों से भी अधिक समय से गुलाम बनाया, और आज भी जिनका 'आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक शोषण' बदस्तूर जारी है, और मोदीराज में "शोषण, जुल्म-उत्पीड़न" कहीं और ज्यादा गहराता ही चला जा रहा है, को इस "आर्य-भारत" शब्द के प्रयोग के जरिये 'आर्य-बरहमन', के मूल-ग्रन्थ 'मनुवाद' की घृणित विचारधारा को फिर से महिमामंडित करना है. संघी 'हिन्दू-राष्ट्र' जो प्रच्छन्न रूप से न सिर्फ अल्पसंख्यक मुसलमानों, ईसाईयों पर आक्रामक हमला बोलना है, बल्कि, अन्य धर्माबलम्बियों जैसे-बौद्ध, सिख, जैन, बहाई, कबीरपंथी, सूफी, और करोड़ों ऐसे लोग जो किसी धर्म को न मानने वाले है, उन्हें चिढ़ाने और उन पर घातक हमला करने जैसा है. आज सचमुच देश के बहुसंख्यक मूलनिवासियों को 'राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक' हर स्तर पर एकजुट होकर इस आतंकवादी विदेशी अल्पसंख्यक 'युरेशियन-ईरानियन आर्य-बरहमन' को माकूल जवाब देने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए. उसे फौरी तौर पे उसका 'सामाजिक-बहिष्कार' कर देना चाहिए.
संसाधनों का बटबारा कर आर्थिक असमानता दूर करो !
जनसमर्थित अर्थशास्त्रियों का दावा है कि जितने लोग AIDS, Malaria and Tuberculosis के चलते मारे जा रहे है उससे कई गुना ज्यादा लोग (खासकर बच्चे व महिलाएं) 'भूख व कुपोषण' के चलते असमय काल-ग्रसित हो रहे है. भूख व कुपोषित लोगों की संख्या प्रत्येक नौ व्यक्ति में से एक (९:१) है जो अमेरिका और यूरोप की कुल आबादी से भी बड़ी है और रोजाना अगले दो वक्त की रोजी-रोटी के जुगाड़ के लिए मशक्क़त/संघर्ष कहीं न कहीं कर रहे होते है.
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयु) का नाम बदलकर बनारस "बाभन" विश्वविद्यालय (बीबायु) करो!
बीएचयु के स्थापना काल से लेकर आजतक; पंचानबे फीसदी (९५%) प्रोफेसर, कर्मचारी, कुलपति, डींन, विभागाध्यक्ष सबके सब बनारसी बाभन ही बनते चले आ रहे है. अगर बाभन ही हिन्दू और हिन्दू ही बाभन है तो फिर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयु) का नाम बदलकर बनारस "बाभन" विश्वविद्यालय (बीबायु) कर दो !
बिहार की धरती पर देशद्रोही आरएसएस-भाजपा को नेस्तनाबूद होना होगा
बिहार के मुख्यमंत्री श्री मांझी पर (जनता दरबार में) हमले की कोशिश की चौतरफा निंदा की जानी चाहिए. इस हमले के पीछे देशद्रोही आरएसएस-भाजपा की साजिश हो सकता है. बिहार में 'सामाजिक-न्याय की शक्तियां' आक्रामक-रूख अख्तियार करे.
यह कांग्रेसियों की बदमाशी थी कि १९३४ (ब्रिटिशकाल में होम रूल) से लेकर १९७० तक बिहार में लगातार स्वर्ण 'बाभन-भूमिहार' को ही एकछत्र मुख्यमंत्री बनाता आया था, और यह स्थिति कमोवेश हर राज्यों की थी जिसे कर्पूरी ठाकुर ने तोड़ने की कोशिश की. हालाँकि, बिहार में इसके बाबजूद; १९८४ तक कांग्रेसी यह खेल खेलता रहा. इसी का नतीजा था कि 'भूमिहार-बाभनों ने लाखों एकड़ जमीने न सिर्फ अपने पास हथियाये रखा, बल्कि, सभी सरकारी, गैर-सरकारी संस्थानों के उच्च पदों पर अपना कब्जा रखा. इसी के चलते भूमिहार-बाभन-ठाकुर का सामाजिक मनोबल आसमान चढ़कर बोल रहा है. आज इसी वजह से सभी सरकारी शिक्षण-संस्थानों (जिसमे मुख्यतः कुलपति, डींन, चैयरमेन से लेकर अन्य भारतीय प्रशासनिक सेवाओं, न्यायालयों आदि के प्रथम तथा दुसरे श्रेणी के पदों पर लगभग अट्ठत्तर फीसदी (७८%) पदों पर 'बाभन-स्वर्ण' कुंडली मारकर बैठा हुआ है. यह बात सड़ांध बाभनवादी आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत भी अच्छी तरह जानते है. लेकिन कुत्ते की दूम कभी सीधी हुई है क्या? यह स्थिति अब हर हाल में बदलनी होगी सामाजिक-न्यायवादी शक्तियों को...
फिल्म 'पीके' का विरोध संविधान-प्रदत 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' पर हमला है
फिल्म 'पीके' का विरोध आधुनिक भारत के लिए एक शर्मनाक घटना है. सेंसर बोर्ड के सदस्यों सतीश कल्याणकर तथा रूप कुमार शर्मा का द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती से मिलकर सफाई पेश करने के लिए नहीं जाना चाहिए था. ये कौन होता है द्वारका पीठ का शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती जिसके पास जाकर सफाई देने की जरूरत थी. फिल्म पीके को Central Board of Film Certification जो सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन काम करने वाली एक सरकारी संस्था है, से मंजूरी मिल चुकी है तो फिर किसी कथित महंतों, बाबाओ, अघोडीनाथ के द्वार पर चक्कर लगाने की क्या जरूरत थी? इन लोगों (कथित शंकराचार्यों) को अगर फिल्म देखने का शौक नहीं है तो उन्हें हवा खाने के लिए 'रियो- बिच' पर जाकर छोड़ देना चाहिए. धर्म के ठेकेदार बने लोगों से इस तरह की मुलाक़ात और पेशी पर जाने से बेवजह उसका मनोबल बढ़ता है और धार्मिक-सांस्कृतिक गुंडागर्दी करने के लिए और ज्यादा प्रेरित होता रहता है. इन्हें राष्ट्रपिता गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करते 'राष्ट्रभक्त' बताते हुए जरा भी शर्म नहीं आती. ज्यादा ऊधम मचाये तो उसे पुलिस के हवाले करो.
भारतीय उप-महाद्वीप में परमाणु युद्ध का खतरा
इंटिग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के प्रमुख एयर मार्शल पीपी रेड्डी के बयान कि भारत को परमाणु-युद्ध लडऩे के लिए तैयार रहना चाहिए, दुर्भग्यपूर्ण है. एयर मार्शल भी जानते है कि यह गली-कूचे में खेला जाने वाला गुल्ली-डंडा, कबड्डी का खेल नहीं है जिसे बार-बार खेला जाय. भारतीय उपमहाद्वीप में परमाणु-युद्ध की कल्पना करना भी दुनिया के सर्वविनाश की कल्पना करने जैसा है. देश की सुरक्षा के बारे में चारो तरफ चौकन्ना रहना/ संवेदनशील रहना बेहद जरूरी है. लेकिन, रक्षा के नाम पर कल्याणकारी क्षेत्रों जैसे- स्वास्थ्य बजट में तीस प्रतिशत (३०%), कृषि बजट में बीस प्रतिशत (२०%) की कटौती करने की कीमत पर खरबों रूपये की रक्षा दलाली, कमीशनखोरी करने, की इजाजत देश की जनता कतई नहीं दे सकती है. भारत के चार लाख कोयला खान मजदूरों के पांच दिवसीय हड़ताल की कार्रवाई को, और बैंकिंग कर्मचरियों के आंदोलन को जबरदस्त समर्थन है.
राम सिंह मेमोरियल ट्रस्ट (रसमत)
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