Sunday, January 11, 2015

Re: जेएनयु के कुछ कटु अनुभव

JNU  insan ko democratic kitna banata hai ..jita jagta udaharan hai. Varchsw ki rajniti apne aap me brshmanwad hai.

With you

On Jan 12, 2015 10:55 AM, "Akhilesh Chandra Prabhakar" <acpjnu@gmail.com> wrote:
जेएनयु के कुछ कटु अनुभव

जेएनयु में गुरूजी गिरिजेश पंत और एस डी मुनि ने 'विश्वविद्यालय अनुदान
आयोग' से पचास लाख रूपये की परियोजना हासिल कर जिस काम को पूरा किया
था...उसी काम को मैंने बगैर किसी प्रकार की आर्थिक सहायता लिए ही पूरा
किया. कृपया; नीचे लिखे विवरण अवश्य पढ़े.

I had presented a paper on "Regional Energy Security Cooperation and
Geo-politics," two days conference (as inaugurated by our former
petroleum and gas minister Mr. Mani Shankar Ayer and Chaired by Mr.
Hamid Ansari (Vice-President of India), organized by Association of
Indian Diplomats at India International Centre ( IIC), New Delhi on
March 10, 2005.

The paper entitled: Regional energy security cooperation and
geo-politics with specific references to India, published by (Leiden
based) BRILL's African and Asian Studies. Volume 4, Issue 3, 1
September 2005, Pages 357-402 [SCOPUS Indexed]. And,

Second paper on India's Energy Security of Supply and the Gulf,
published by SAGE's India Quarterly, Vol. LX. No.3. July-September,
2004, New Delhi [Indian Council of World Affairs (ICWA)].



मैंने शोध-छात्रवृत्ति के लिए इनसे सिर्फ आठ हजार रूपये महीने का
मेहनताना माँगा था जिसे खारिज कर दिया गया. ऊर्जा सुरक्षा पर मेरे
'शोध-आलेख' को स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज से प्रकाशित होने वाले जर्नल ने
तब प्रकाशित करने से मना किया था क्योंकि यहाँ भी गुरूजी गिरिजेश पंत और
एस डी मुनि उस जर्नल के सम्पादकीय सदस्य हुआ करते थे. अलबत्ता,  उसी आलेख
को प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रिय और राष्ट्रीय जर्नल ने बाद में प्रकाशित
किया.

बिशेषज्ञ द्वारा; मेरे 'पीएचडी थीसिस के रिपोर्ट' आने के बाबजूद भी सालभर
से ज्यादा समय लग गए इन्हें डिग्री निर्गत करने में...जबकि, मेरे साथ ही
पीएचडी थीसिस जमा करने वाले मेरे एक मित्र (जो तत्कालीन प्रधानमन्त्री
श्री अटल बिहारी वाजपेयी के सुरक्षा गॉर्ड का भाई हुआ करता था) का
'पीएचडी थीसिस रिपोर्ट' महज ग्यारह दिनों के अंदर ही मंगा लिया गया और
तेरहवें दिन उसे पीएचडी डिग्री निर्गत कर दी गयी जो आज उसी जेएनयु में
सहायक प्रोफेसर पद पर कार्यरत है. आप आसानी से समझ सकते है कि वह कौन हो
सकता है?

मनोगत ग्रंथियों से ग्रसित पूर्वाग्रही 'मानसिकता' को इस बात से भी समझा
जा सकता है कि गुरूजी गिरिजेश पंत जब दून विश्वविद्यालय के कुलपति बने तब
इथियोपिया से मुझे २०११ के १७ मई को साक्षात्कार के लिए दून
विश्वविद्यालय बुलाया तो वहाँ भी एकबार फिर मुझे खारिज किया गया.
हालांकि, तबतक मैं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के अंतर्गत;
इथियोपिया में छह साल पढ़ाने का अनुभव प्राप्त कर चुका था. यह सिलसिला
एकबार फिर २०१४ में भी दोहराया गया जब जेएनयु के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल
स्टडीज का डीन बने गुरूजी गिरिजेश पंत ने 'अफ्रीकन स्टडीज केंद्र' में
सहायक प्रोफेसर पद के लिए जेएनयु कुलपति के दबाव में मुझे साक्षात्कार के
लिए आमंत्रित तो किया गया, परन्तु; यहां भी कम्बख्तों ने मुझे 'अयोग्य'
घोषित करने के एक लाख बहाने ढूंढ लिए.

बहरहाल, खारिज होना अब हमारी नियति नहीं...बल्कि, 'बाभनवाद के खिलाफ
अनवरत लड़ने के जज्बे के 'ऊर्जा का मुख्य श्रोत' बन गया है.

आपका,

ए. सी. प्रभाकर




Dr. A.C.Prabhakar
Senior Lecturer
Department of Economics
School of Economics, Finance & Banking
College of Business
Universiti Utara Malaysia
06010 Sintok, Kedah Darul Aman
Malaysia

Phone: +60-175221803 (Mobile)
Email:acp@uum.edu.my/acpjnu@gmail.com

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