कारपोरेट दलाल मोदी सरकार के 'अध्यादेशराज' के खिलाफ आवाम के जुझारू संघर्ष
अम्बानी की फासीवादी, कॉर्पोरेट दलाल 'मोदी सरकार के अध्यादेशराज' के
खिलाफ लाखों जनता सड़कों पर उतर चुकी है. चंद बड़े कारपोरेट व व्यापारिक
घरानों के हित में किसानों की जमीन औने-पौने दामों पर जबरिया 'भूमि हड़प
विधेयक', और श्रमिक विरोधी 'श्रम- कानूनों में बदलाव' के खिलाफ भारतीय
आवाम के ऐलान-ए-जंग को गर्मजोशी भरा सलाम!
हम सभी जानते है कि यह वही नरेंद्र मोदी है जिसने गुजरात के मुख्यमंत्री
रहते उद्योगपति गौतम आदाणी को सिर्फ एक रुपये के (डर्टी चीप) के दर पर
हजारों एकड़ जमीने हड़पने में मदद पहुंचाया था.
दकियानूसी आरएसएस प्रमुख भागवत का अनर्गल बयान बर्दाश्त नहीं
जाहिर है, मोदी सरकार के खिलाफ उबले जनाक्रोश को भटकाने के उद्देश्य से
ही 'पूंजीपतियों के दलाल, दलित-आदिवासी विरोधी, दकियानूसी, देशद्रोही,
आरएसएस प्रमुख श्री मोहन भागवत ने "नोबेल विजेता मदर टेरेसा" के बारे में
अनर्गल अनाप-शनाप बयानबाजी शुरू किया है जो बर्दाश्त के लायक नहीं है. आज
अधिक से अधिक चौकस-चौकन्ना रहने की जरूरत है. ये मोहन भागवत जिस
'हिंदुत्व' की बात करता है वह दरअसल शूद्रों-दलितों-आदिवासियों-पिछड़ी
जातियों की छाती पर खड़ा होकर नाग-नागिन की तरह नाचने वाला पश्चिम एशिया
से आये युरेशियन आर्य 'बाभनवाद' है जिसे हर हाल में भारत-भूमि से मिटना
होगा...ताकि अपवित्र भारत माता को पवित्र किया जा सके.
आरएसएस ने "अन्ना हजारे" को एकबार फिर दिल्ली में बिठाने का षड्यंत्र रचा
है. यह उसी तरह की चाल है जैसे कांग्रेस ने "जमींदारी-उन्मूलन" और
"भूमि-सुधार क़ानून" को लागू कराने के लिए कम्युनिष्टों के नेतृत्व में
संगठित किसान आंदोलन को भटकाने के लिए कथितरूप से बिनोबा भावे का
इस्तेमाल कर "भू-दान आंदोलन" का नारा दिया था, जिसका नतीजा सबको मालूम ही
है...
राहुल गांधी की घोर कायरता
कांग्रेस नेता राहुल गांधी को आज मोदी सरकार के खिलाफ पूरी शिद्दत के साथ
कमर कसकर और खूंटा गाड़ कर लड़ने की जरूरत थी...तब राहुल ने ऐसे समय में
छुट्टी पर जाने का फैसला लेकर अपनी कायरता का परिचय दिया है. ये जनाब
मैदान में कभी लड़ेंगे नहीं पर इन्हें केवल राजगद्दी चाहिए जो अब मिलने
वाली नहीं है.
मुलायम की मुलायमियत 'निर्लज्जता की पराकाष्ठा' है
पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह से मोदी ने 'ब्यूह-रचना' रचकर पूरे उत्तर
प्रदेश में कृत्रिमरूप से 'सांप्रदायिक दंगा-फसाद का माहौल' पैदा कर
लोकसभा की लगभग सभी सीटें लूट लिया था, उसके बाद मुलायम को
'सांप्रदायिक-शक्तियों के खिलाफ' जंग छेड़ देना चाहिए था. अलबत्ता, मोदी
सरकार के खिलाफ जिस समय माकपा मोर्चा खोलने का ऐलान कर रही थी...ठीक उसी
समय, माकपा का जिगरी दोस्त रहे मुलायम-लालू "हर-हर मोदी" को "घर-घर
मोदी" कराने तिलक के बहाने कालीन बिछा रहे थे. उत्तर-प्रदेश समेत पूरे
देशभर की धर्मनिरपेक्ष कतार ठगा सा महसूस कर रहे है. ऐसे कई मौके पर
मुलायम यादव ने जनता के उबलते गुस्से पर ठंढा पानी डाला है. ऐसा लगता है
जैसे मानों वह अपने दिमाग से काम करने की बजाय अपने शरीर से ही ज्यादा
काम लेते है.
लाल झंडे अब सड़कों पर
दक्षिण भारत के राज्य केरल में पिछले सफ्ताह CPIM के २१वे राज्य सम्मेलन
जैसे निजी कार्यक्रम में जिस तरह नयी स्फूर्ति, नयी ऊर्जा के साथ
जन-सैलाब को उमड़ते हुए देखा गया उसे देखकर दूसरी अन्य पार्टियों को
ईर्ष्या हो सकती है. वहीँ आज (२५ फरवरी) से लखनऊ में भाकपा (माले) के
राष्ट्रीय अधिवेशन के मौके पर भी 'पूरा शहर लाल-झंडे से पट जाने वाला है.
हालांकि, सफ्ताह भर की ये सभी राजनीतिक घटनाएँ बड़े इजारेदार कॉर्पोरेट
नियंत्रित मीडिया को शायद ही दिखाई दे.
बिहार की नीतीश सरकार अपनी प्राथमिकता तय करे
बिहार में मांझी को पटखनी देकर दोबारा कार्यालय संभालने वाली नीतीश सरकार
को अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करनी होगी. जनता चाहती है:
१. समान काम के लिए समान वेतन के आधार पर सभी नियोजित/ठेका/मानदेय पर रखे
गए कर्मचारियों व शिक्षकों को फ़ौरन नियमित व स्थायी किया जाय.
२. सभी कुशल व प्रशिक्षित बेरोजगारों को तुरंत बहाल किया जाय.
३. भूमि-सुधार कानून को लागू करने हेतु बंधोपाध्याय आयोग की सिफारिशों को
शत-प्रतिशत लागू किया जाय ताकि 'जमींदारी-प्रथा का उन्मूलन' किया जा सके.
४. शिक्षा हब बनाने के लिए राज्यभर में नए स्कूलों, कॉलेजों,
विश्वविद्यालयों का जाल बिछाया जाय ताकि मानवीय पूँजी का समुचित उपयोग
किया जा सके. हम यहां याद दिलाता चले कि मात्र तीन करोड़ की आबादी वाले
मलेशिया जैसे देश में तकरीबन अट्ठाईस (२८) सरकारी/पब्लिक विश्वविद्यालय
है जहां सौ फीसदी छात्रों को छात्रावास की सुविधा उपलब्ध है, और जहां
गुणबत्तापूर्ण विश्व-स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर/ढांचा तैयार है. यहां तक की
इथियोपिया जैसे गरीब अफ़्रीकी देश जहां की आबादी मात्र सात-आठ करोड़ है
वहाँ भी तीस से ज्यादा केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किये गए है.
चौबीसों घंटे बिजली सप्लाई की जा रही है. तो फिर बिहार में क्यों नहीं?
५. पूर्व की जदयू-भाजपा की साझी नीतीश सरकार ने महत्वपूर्ण प्रशासनिक
पदों; विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति; न्यायालय-कोर्ट-कचहरी,
तथा सड़क निर्माण व अन्य ढांचागत क्षेत्रों के ठेका में बहुमत
दलित-आदिवासी-पिछड़े तथा अल्पसंख्यक आबादी की अनदेखी की गयी है. उसे अब हर
हाल में रोका जाना चाहिए. राज्य के प्रशासनिक तंत्र पर कब्जा जमाये
"भ्रष्ट व जातिवादी सवर्णों" को खदेड़ने की आज जरूरत है ताकि सामाजिक
परिवर्तन में तेजी लाया जा सके.
६. ऐसे कमीशनखोर अपराधी विधायकों, व पूर्व मंत्रियों को जो पैसे लूटकर
नए-नए कीमती प्लाट खरीदने, पेट्रोल पम्प, बिस्कोमान, होटल, शो-रूम खोलने
में लिप्त रहा है… उनकी सम्पत्ति जब्त हो, उनकी विधानसभा सदस्य्ता
निलंबित हो और उन्हें जेल भेजे जांय. नीतीश कुमार ने गरीब बटाईदार विरोधी
ललन सिंह और पी के शाही को दोबारा मंत्री बनाकर बहुत बड़ी भूल की है. इन
दोनों को बर्खास्त किया जाना चाहिए.
ए. सी. प्रभाकर
तीसरी दुनियां का सामाजिक नेटवर्क्स
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