Monday, September 9, 2013

Hastakshep.com पर आज के ताज़ा आलेख और समाचार

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असलियत वहाबियत की

Posted: 09 Sep 2013 03:31 AM PDT

खुर्शीद अनवर हालाँकि पहले भी आतंकवाद पर कोई बहस या बात चीत आम जन के दिमाग़ को सीधे इस्लाम की तरफ ले जाती थी लेकिन विश्व व्यापार केन्द्र पर हमले और उसके बाद "आंतकवाद के खिलाफ़ जंग", "दो सभ्यताओं के बीच टकराव" के नारों ने ऐसी मानसिकता बनायी कि दुनिया भर में एक खास समझ [...]

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SOCIALIST PARTY CONDEMNS US HEGEMONIC DESIGNS & THE IMPENDING WAR ON SYRIA

Posted: 09 Sep 2013 02:49 AM PDT

New Delhi. Socialist party condemned US hegemonic designs And the impending war on Syria. Party Generel seceratry Dr. Prem Singh and Vice president Sandeep Pandey said, "Once again the US is on the verge of attacking a sovereign nation on the of dubious & fraudulent evidence, which will only be...

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क्या हमारे नेताओं के साथ-साथ हमारे भी मुँह लहू लग गया है?

Posted: 09 Sep 2013 02:26 AM PDT

हम अपनी खामोशियों के गुनाहगार रहे/ वे जूनून बनके सबके सर पे सवार रहे  (मुजफ्फरनगर दंगों के बाद एक फौरी अपील) अशोक कुमार पाण्डेय लहू का आदिम खेल फिर ज़ारी है। फिर ज़ारी है अफवाहों का वलवला और पतित राजनीति के षड्यंत्रों का सिलसिला। धरम के नाम पर फिर हथियार निकल गये हैं और इंसानी [...]

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अंजाम कभी जंग का अच्छा नहीं होता, बारूद कभी जख्म का मरहम नहीं होती

Posted: 08 Sep 2013 03:07 PM PDT

बारूद कभी जख्म का मरहम नहीं होती वसीम अकरम त्यागी जिस मुजफ्फरनगर की आग की लपटें मेरठ के गाँवों तक और शामली तक पहुँच गयी है अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर यह शहर उर्दू के मशहूर शायर, अशोक साहिल, खालिद जाहिद मुजफ्फरनगरी, और मरहूम मुजफ्फर रज्मी कैरानवी के नाम से जाना जाता है। अपनी शायरी के द्वारा [...]

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मृतक तो महज़ आँकड़े होते हैं…

Posted: 08 Sep 2013 11:52 AM PDT

मोहन श्रोत्रिय हथियार किसी के, हाथ किसी के… मरने-मारने वाले कब समझेंगे इस बहकी-वहशी सियासत के खेल को ! लड़ाने वालों और लड़ने वालों के हित एक नहीं हैं कितना खून बह जाने के बाद समझ में आयेगी यह छोटी-सी बात ! लड़ाने वाले बचे रह जाते हैं और मोहरा बने लड़नेवाले धो बैठते हैं [...]

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हमेशा व्याख्याओं पर निर्भर करता है सत्य : प्रियदर्शन

Posted: 08 Sep 2013 08:56 AM PDT

भाषा को सहज होना चाहिये, सरल नहीं   भाषा हमारे सरोकार से बनती है और सरोकार कोई भारी शब्द नहीं, यह चीजों और स्थितियों के साथ हमारे जुड़ाव से पैदा होता है आगरा। 'कल्पतरु एक्सप्रेस' के हर माह आयोजित होने वाले मीडिया विमर्श की सातवीं शृंखला के अन्तर्गत एनडीटीवी-इंडिया के वरिष्ठ संपादक प्रियदर्शन ने कहा...

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