Wednesday, March 19, 2014

दलित नायक, भाजपा और कम्युनिष्ट

दलित नायक, भाजपा और कम्युनिष्ट

 

बड़े अचरज की बात है कि जो खुद को कल तक अम्बेडकरवादी, दलितों का मसीहा घोषित करते नहीं थकते थे वे ही आज 'ब्राह्मणवादी हिन्दूत्वा" के पैरोकार, संघ परिवार के राजनीतिक बाजू भाजपा की पालकी उठाने वाले कहार बनकर अपने पक्ष में सौ तर्क-कुतर्क पेश करने में लगे है.

 

यह जानते हुए भी कि हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं है बल्कि बदमिजाजी तुलसीदास द्वारा कृत्रिम तरीके से "जातिगत पिरामिड" खड़ा किया हुआ षड्यंत्र है जहां से ऊपर या नीचे आने जाने का कोई रास्ता नहीं है. पर जातिगत दुर्गंध या बदबू हरेक मंजिल पर ब्राह्मणों की बस्तियों से ही होकर निर्बाधरूप से आती जाती रहती है...जिसके बारे में आंबेडकर ने बहुत साफ़-साफ़ शब्दों में कहा था, सदियों से अमानवीय जिंदगी जीने को अभिशप्त आदिवासियों, दलितों, पिछड़ेवर्गों और महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक शोषण-उत्पीड़न की बेड़ियों को तोड़ने के लिए खुद को हिन्दू धर्म से आजाद कर लेना चाहिए और एक नया रास्ता जहां समानता, भाईचारा की गुंजाईश हो बौद्ध धर्म को अपना लेना चाहिए.

 

इन्हीं रास्ते पर चलकर दलितों-आदिवासियों-पिछड़ेवर्ग के कथित नायकों की तरह दिखने वाले 'उदित राज, छेदी पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, राम कृपाल यादव, रामविलास पासवान, अनुप्रिया पटेल' बड़े हुए है. यह नयी पीढ़ी भी दरअसल उसी अवसरवादी रास्ते को अपनाया है...जिस रास्ते को कभी नामदेव ढसाल, हिंदी पट्टी के आंबेडकरवादियों के बीच आदर पाने वाले बीपी मौर्य, संघप्रिय गौतम, शैलेष मटियानी ने अपनाया था. जिन्हौने कम्युनिष्टों को हमेशा शक की निगाह से देखने, सवर्ण बताकर कम्युनिष्टों को गाली देने और अंततः संघी सवर्णों के थाली का जूठन खाने की होड़ में शामिल होते रहे. गटर में गिरने वाले सत्ता के दलालों को इतिहास बहुत ज्यादा दिनों तक याद रखने नहीं देगा. 

 

संघ- भाजपा के नरेंद्र मोदी हालांकि वैसे तमाम पूंजीपतियों, सामंतो विदेशी साम्राज्यवादियों की मदद के बाबजूद; दिल्ली की गद्दी पर बैठने नहीं जा रहा है. और अगर किसी कारण से सत्ता तक पहुँच भी जाता है तो फिर भी अस्पृश्यता, शोषण-जुल्म-उत्पीड़न के खिलाफ लड़ाई जारी ही रहने वाली है, और इस लड़ाई को पहले की ही तरह कम्युनिष्ट ही आगे ले जायेंगे.

 

बहरहाल, आज जो लोग देश के राजनीतिक हालात को भाजपा और नरेंद्र मोदी के पक्ष में होने देने में मदद पहुचा रहे है और उसकी (मोदी) सरकार गठन की सारी अनिश्चयता खत्म होने की घोषणा कर रहे है उनसे आने वाले दिनों में दलित- पिछड़ेवर्ग के लोग हिसाब मांगेंगे...कि, 'डाइवर्सिटी' के नाम पर सामाजिक न्याय तथा सामाजिक समरसता के झूठे वायदे करने वाली भाजपा दलितों, अन्य पिछड़े वर्गों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को कितना फायदा दिलाने जा रही है. नरेंद्र मोदी के कथित ठोस विकास एवं सशक्तिकरण के दावे "दलित, पिछड़े एवं वंचित वर्गों के उद्यमशीलता एवं व्यवसाय" के कितने अवसरों को बढ़ावा मिला? याकि, चंद नए ठीकेदार, माफिया दलाल पैदा होकर हर बार की ही तरह इस बार भी आम दलितों-पिछड़ों के सीने और पीठ में खंजर भोंका गया है?  उदित राज, राम कृपाल यादव, रामविलास पासवान, अनुप्रिया पटेल को जवाब देने के लिए तैयार रहना होगा. 

उत्तर-प्रदेश में जिस तेजी के साथ 'चुनावी राजनीती' अपनी करवटें बदलती जा रही है उसमे भाजपा का मुकाबला करने के लिए 'मुलायम-मायावती-कम्युनिष्ट' को पूरी मुखरता के साथ कदमताल बढ़ाना चाहिए.

 

डॉ. दाभोलकर विचार मंच

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