भारत को नेपाल से सीखना चाहिए
पिछले साल नवम्बर महीने में सम्पन्न हुए चुनाव में नेपाल की जनता ने दृढ़ता-पूर्वक 'अमरीकी पिट्ठू, सामंती- राजशाही हिंदुत्वा साम्प्रदायिक प्रजातांत्रिक पार्टी' को ठुकरा कर 'धर्म-निरपेक्ष व जनतांत्रिक' नेपाल के पक्ष में जनादेश दिया था. नेपाल की बहादुर, प्रगतिशील जनता से भारत की जनता को भी सीखना चाहिए. नेपाल में द्वि-स्तरीय चुनाव प्रणाली की वजह से 'जनता के कुल मतों का मूल्य' नेपाली संसद में प्रतिबिंबित हो रहा है जहां एक तरफ नेपाल की जनता सीधे उम्मीदवारों को अपना प्रतिनिधि चुनकर संसद में भेजती है तो वहीँ दूसरी तरफ, आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिये राजनीतिक पार्टियों को उसके कार्यक्रम के आधार पर अपना मत देकर संसद में प्रतिनिधित्व कराती है. जिससे पक्ष व विरोध के सभी मतों का मूल्य आसानी से निर्धारित हो जाता है. जबकि भारत में ऐसा नहीं है. मान लो अगर कोई उम्मीदवार सिर्फ एक वोट के अंतर से जीतने में सफल हो जाता है मगर उसके विरोध में दिए गए बहुसंख्य मत तो मूल्यविहीन ही है और इस मूल्यविहीन विरोधी मतदाताओं को पांच साल बाद तक विकास का लाभ पाने के लिए आस लगाए रहना होगा.
नरेंद्र मोदी आरएसएस के जिस रथ का सारथी बना है उसका एक पहिया कॉरपोरेट लूट और दूसरा ब्राह्मणवादी सामंती-सांप्रदायिक उन्माद का पहिया है जो भारत को रसातल में ले जाने के लिए कटिबद्ध है. उसके दिल्ली की गद्दी पर बैठने की कल्पना करने भर से ही मेरे जेहन में साफ़-साफ़ तस्वीरें उभरने लगती है:
एक, पड़ोसी मुल्कों; नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका के साथ तनावपूर्ण रिश्ते को बढ़ावा मिलेगा.
दो, परमाणु सम्पन्न शक्तिशाली चीन व पाकिस्तान के साथ युद्धोन्माद पैदा करने और साम्राज्यवादी अमेरिका के सामने मिमियाने का दौर शुरू हो जाएगा.
तीन, अल्पसंख्यकों, दलितों-आदिवासियों, और आम मजदूरों के हक मारे जायेंगे.
हालांकि, आरएसएस-भाजपा के बरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज, प्रवीण तोगड़िया, लालजी टंडन, कैलाशपति मिश्रा, अश्वनी चौबे, गिरिराज वगैरह के सब्र का बाँध भी अब धीरे-धीरे टूटने लगा है कि, नरेंद्र मोदी को सिर्फ 'ब्राह्मणवादी रथ' का सारथी बने रहने को कहा गया था...परन्तु; उसने (मोदी) ने तो पूरे रथ में और उसके पीछे पीछे चलने वाले ट्रक में रामविलाश, उदितराज, रामकृपाल, साधू यादव, रेनू के पति कुशवाहा जैसे सवारी से ठसाठस भर कर उनके लिए जगह किनारे में छोड़ दिया है.
तमिलनाडू और आंध्र-प्रदेश में वामदलनीत 'धर्म-निरपेक्ष गठबंधन' का स्वरूप नहीं उभरता है तो इन दोनों राज्यों में वामदलों को सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करना चाहिए.
लालू की जगहंसाई
बिहार में साम्प्रदायिक रथ रोकने को बार-बार लालू ताल ठोंके जा रहे है. उसके पीछे रह गए है अब उनकी पतिव्रता धर्मपत्नी राबड़ी, फर्जी डिग्रीधारी (डाक्टर) बेटी मीसा और बेटा तेजस्वी नारायण. क्या इसी पारिवारिक सेना से रोकोगे साम्प्रदायिक रथ को?
सूना है 'दस मूर्ख दोस्त से अच्छा होता है एक समझदार दुश्मन', यह बहुत ही पुरानी किन्तु; प्रचलित कहावत है. हमने तो समझा था कि 'चलो बीस बरस की गद्दी न सही पर कम से कम घोड़े तो अस्तवल में पाल-पोसकर जमा किया ही होगा. बहुत अफ़सोस होता है देखकर कि राजद में जिस तरह से आजकल भगदड़ मची हुई है उससे लगता है कि लल्लू भाई ने सिर्फ काली भैंस पाल रखा था...जिधर जिसे देखो, हर कोई भैंस खोलकर भागे जा रहा है.
साम्प्रदायिक-फासीवाद विरोधी जन मंच
Santosh Kumar
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