(जे. पी. ने यह अपने दिल की बात जेल में 1975-76 के दरमियान ही लिख डाली थी.)
यह तथ्य हमने धीर पुरूषों से सुना......................
जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएं जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से,
तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं !
सफलता और विफलता की
परिभषाएं भिन्न है मेरी !
इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमंत्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रांति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ संघर्ष के, संपूर्ण क्रांति के.
जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंजिलें.
तो, विफलता पर तुष्ट हूँ अपनी,
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईस को.
जयप्रकाश नारायण.
सर्वादय आंदोलन के 1974-77 के समय में जो कार्यकर्ता संघर्ष में लगे थे उन्हें विनोबाजी ने एक अमूल्य संदेश दिया था, जो सब को आज भी उतनाही जीवन में उतारने के योग्य हैः
" सत्य, अहिंसा और संयम "
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