Saturday, December 20, 2014

चीन ने अमरीका को पछाड़ दिया है

 

चीन ने अमरीका को पछाड़ दिया है

 

पिछले 140 सालों में यह पहली बार हुआ है जब अमरीका ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का रुतबा खो दिया है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) के मुताबिक़; चीन की मौजूदा अर्थव्यवस्था 17.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गयी है. जबकि आईएमएफ़ ने अमरीका के लिए 17.4 ट्रिलियन डॉलर का जो अनुमान लगाया है. पिछले 30 सालों में चीन ने लोगों को चौंका देने वाली रफ़्तार से तरक़्क़ी है. चीनी निर्यात की बजाय घरेलू निवेश पर अधिक जोर दिया. घरेलू मांग बढ़ाकर घरेलू बाजार का विस्तार करने की नीति ने ही आज चीन को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है.

 

भारत में १९९० से ही मनमोहन से लेकर मोदी सरकार ने निर्यात को बढ़ावा देने वाली आर्थिक उदारवादी नीतियां जारी रखा जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था ट्रिलियन डॉलर से भी कम पर सिमटी हुई है. अम्बानी-अडानी पोषित ब्राह्मणवादी हिंदू सरकार का पूरा ध्यान इस समय "साम्प्रदायिक-उन्माद" भड़का कर "हिन्दू-राष्ट्र" बनाने पर केंद्रित है.  कथित 'भारत विजय फतह' करने वाले 'आरएसएस-भाजपा' के हर-हर महापुरूष मोदी, लोकसभा चुनाव जीत कर भी भारत की पुष्ट/मजबूत 'धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक-विचारधारा' से हार चुका है.

 

शीतकालीन सत्र के दौरान संसद और खासकर राज्यसभा में चले बहस-मुबाहिशे का जवाब देकर 'राजनीतिक मूर्खता' का परिचय दिया है.  शेर हो या सियार उसके दाव-पेंच जंगल में ही काम आते है. चीन के सर्कस में शेर को चाबूक के इशारे पे उठते-बैठते मैंने देखा है. और शेर की पीठ पर बकरी को झूमते आपने भी देखा होगा. उत्तर भारत का कथित ब्राह्मण ह्रदय सम्राट, न्यूयॉर्क का रॉकस्टार, बनारस का हर-हर मोदी, उत्तर भारत का तथाकथित दलित (जिसे सर पे मैला ढोने से 'आध्यात्मिक-सुख' की प्राप्ति होती है) को इस बात का बेहद अफ़सोस है कि गुजरात जैसे बयाबान जंगल के गूंगे विधानसभा की तरह महानगर दिल्ली स्थित लोकसभा-राजयसभा में उन्हें उतनी आजादी अब नहीं रही...यहां के संसद में सांसद उन्हें 'ट्विटरबाज, फेसबुकबाज, ब्लॉगबाज प्रधानमन्त्री के रूप में खिल्ली उड़ाकर उनका  "घर वापसी" करा रहे है. यहां हर बात में टोका-टोकी है. संसद में विपक्षी दलों की 'संवैधानिक हैसियत' न्यूनतम होने के बाबजूद; उनकी मुखरता, उनकी प्रखरता, उनकी 'राजनीतिक तेज धार' का मुकाबला करने में कुछ सूझ नहीं रहा है...

 

राम सिंह मेमोरियल ट्रस्ट (रसमत)

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