Sunday, August 30, 2026

Mohd. Usman’s Tunday Kababi: From Culinary Fame to Environmental Shame - “Pollution on Tunday’s Plate” as Urvashi Sharma Pushes Accountability Over Deliberate Pollution Violations.



Lucknow:Sunday, 30 August 2026 :
Serious questions are emerging over pollution-related non-compliance at four outlets of Tunday Kababi, associated with Mohd. Usman and his sons, after a government record generated through an IGRS complaint documented regulatory action concerning air pollution at the establishments in Aminabad, Aliganj, Hussainabad and Balaganj.

 

The record stems from a complaint filed by Urvashi Sharma, a leading Social, RTI and IGRS activist, under IGRS reference 60000260176282 dated 02 July 2026. The complaint specifically identified Tunday Kababi establishments at locations including Khaliganj, Aminabad; Tundey Tower, Kapoorthala Road, Aliganj; Hussainabad; and Hussainbari, Balaganj.

 

The official disposal report records that the concerned pollution-control unit inspected the establishments on 05 August 2026. It further records that, following inspection, a notice dated 05 August 2026 was issued giving the unit the last opportunity to obtain consent relating to water and air pollution. The record therefore raises a fundamental regulatory question: whether commercial food establishments generating cooking emissions, wastewater and associated pollution loads were operating with all legally required environmental permissions and pollution-control safeguards.

 

Under India's Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981, emissions from regulated activities are subject to the statutory consent framework, including Section 21. The Uttar Pradesh rules specifically prescribe an application for consent for emission under Section 21. The Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974 similarly regulates discharge of sewage or trade effluent and requires statutory consent in circumstances covered by Section 25. The Environment (Protection) Act, 1986, including Section 7, prohibits emissions or discharges of environmental pollutants beyond prescribed standards.

 

The implications extend beyond paperwork. India's environmental jurisprudence recognises the precautionary principle and polluter-pays principle, with the Supreme Court repeatedly treating environmental protection as integral to constitutional rights and holding that private entities can face environmental liability. The National Green Tribunal Act, 2010 expressly requires environmental disputes to be approached through principles including sustainable development.

 

The international dimension is equally significant. Rio Declaration Principles 15 and 16 embody the precautionary and polluter-pays approaches, while the Convention on Biological Diversity emphasises conservation, sustainable use and protection of life-supporting ecological systems. The UN Committee on Economic, Social and Cultural Rights has recognised a healthy environment as an underlying determinant of the right to health, while its 2025 General Comment No. 27 specifically warns that pollution threatens the rights of present and future generations.

 

This makes the controversy larger than the commercial interests of any restaurant chain. If pollution-control obligations are avoided to maximise private profits, the resulting environmental burden is transferred to residents, workers, other living beings and ultimately future generations.

 

Urvashi Sharma's IGRS intervention has consequently converted a local pollution complaint into a question of regulatory accountability: whether environmental laws apply equally to powerful and commercially successful establishments, whether pollution-control consent is actually secured and maintained, and whether authorities will ensure compliance before environmental damage becomes irreversible.

 

The government record now provides an official trail. The next test is whether inspection, consent, pollution-control measures and continuing compliance will be independently verified and whether public health will prevail over private profit.

 

 

 

 


“टुंडे की थाली में प्रदूषण” - मोहम्मद उस्मान का टुंडे कबाबी “पाक कला प्रसिद्धि से पर्यावरणीय शर्मिंदगी” तक - उर्वशी शर्मा ने जानबूझकर किए गए प्रदूषण उल्लंघनों पर जवाबदेही तय करने की मांग तेज की.



मोहम्मद उस्मान का टुंडे कबाबी
पाक कला की प्रसिद्धि से पर्यावरणीय शर्मिंदगी” तक - “टुंडे की थाली में प्रदूषणउर्वशी शर्मा ने जानबूझकर किए गए प्रदूषण उल्लंघनों पर जवाबदेही तय करने की मांग तेज की.

 

लखनऊ, 30 अगस्त 2026

लखनऊ की मशहूर कबाब की पहचान से जुड़े टुंडे कबाबी पर अब एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा। मोहम्मद उस्मान और उनके पुत्रों से जुड़े टुंडे कबाबी के चार प्रतिष्ठानों को लेकर सामने आए सरकारी अभिलेखों ने वायु और जल प्रदूषण संबंधी नियमों के अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

मामला केवल शिकायत का नहीं है। सरकारी अभिलेखों में दर्ज कार्रवाई बताती है कि संबंधित प्रदूषण नियंत्रण इकाई ने टुंडे कबाबी के प्रतिष्ठानों का 05 अगस्त 2026 को निरीक्षण किया और उसी दिन  नोटिस जारी करते हुए जल और वायु प्रदूषण से संबंधित आवश्यक सहमति प्राप्त करने का अंतिम अवसर दिया।

 

यह कार्रवाई सामाजिक, सूचना का अधिकार और जनशिकायत कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा द्वारा दर्ज कराई गई जनशिकायत संख्या 60000260176282, दिनांक 02 जुलाई 2026 के बाद सामने आई। शिकायत में ख्यालीगंज, अमीनाबाद स्थित टुंडे कबाबी, कपूरथला मार्ग, अलीगंज स्थित टुंडे टावर, हुसैनाबाद और हुसैनबाड़ी, बालागंज स्थित प्रतिष्ठानों को चिन्हित किया गया था।

 

यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है।

यदि किसी प्रतिष्ठान को निरीक्षण के बाद प्रदूषण संबंधी आवश्यक सहमति प्राप्त करने के लिए अंतिम अवसर देना पड़ा, तो उससे पहले वह किस नियामकीय स्थिति में संचालित हो रहा था।

यह प्रश्न किसी राजनीतिक बयान या सामाजिक माध्यम पर लगाए गए आरोप से नहीं, बल्कि सरकारी कार्रवाई के अभिलेख से पैदा हुआ है।

 

थाली में प्रदूषण” का सवाल

टुंडे कबाबी की पहचान स्वाद और पाक विरासत से जुड़ी रही है। लेकिन किसी भी लोकप्रिय खाद्य प्रतिष्ठान की व्यावसायिक सफलता उसे पर्यावरणीय कानूनों से अलग नहीं करती।

 

भोजनालय जैसी व्यावसायिक गतिविधियों में खाना पकाने से निकलने वाला धुआं और उत्सर्जन, पानी की खपत, मलजल तथा अन्य अपशिष्ट पर्यावरणीय नियमन के दायरे में आ सकते हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि कबाब कितने लोकप्रिय हैं। सवाल यह है कि क्या कानून के तहत आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण और पर्यावरणीय अनुपालन पूरी तरह सुनिश्चित किया गया था।

भारत का वायु प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 1981 निर्धारित परिस्थितियों में औद्योगिक संयंत्रों और उत्सर्जन से संबंधित सहमति व्यवस्था निर्धारित करता है। जल प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 1974 भी निर्धारित परिस्थितियों में मलजल और व्यापारिक अपशिष्ट के निर्वहन को नियामकीय नियंत्रण के अधीन रखता है।

इसके अतिरिक्त पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 पर्यावरणीय प्रदूषकों के निर्धारित मानकों से अधिक उत्सर्जन या निर्वहन पर रोक लगाता है।

इस कानूनी ढांचे के सामने सरकारी अभिलेख में दर्ज सूचना एक असहज सवाल छोड़ती है।

क्यों प्रतिष्ठानों का संचालन बिना आवश्यक पर्यावरणीय अनुपालन के साथ हो रहा था और  नियामकीय प्रक्रिया जागरूक नागरिक उर्वशी शर्मा कि शिकायत के बाद सक्रिय हुई।

 

चार प्रतिष्ठान, एक बड़ा सवाल

इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि शिकायत में एक नहीं बल्कि चार प्रतिष्ठानों का उल्लेख है।

अमीनाबाद से लेकर अलीगंज, हुसैनाबाद और बालागंज तक एक ही कारोबारी पहचान से जुड़े प्रतिष्ठानों के संबंध में प्रदूषण संबंधी नियामकीय कार्रवाई का अभिलेख सामने आना इस बात की मांग करता है कि जांच केवल एक प्रतिष्ठान तक सीमित न रहे।

प्रत्येक प्रतिष्ठान के लिए यह सत्यापित किया जाना चाहिए कि आवश्यक स्थापना की सहमति और संचालन की सहमति, जहां कानूनन लागू हों, प्राप्त की गई थीं या नहीं। यह भी निर्धारित किया जाना चाहिए कि स्वीकृत शर्तों के अनुरूप प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्थाएं वास्तव में स्थापित और संचालित थीं या नहीं।

 

 

मामला केवल कागजों का नहीं

पर्यावरणीय उल्लंघन को केवल अनुज्ञा या अनुमति की तकनीकी कमी मानना पर्यावरण कानून की मूल भावना को कमजोर करता है।

भारत की न्यायपालिका ने पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में सावधानी का सिद्धांत और प्रदूषक द्वारा भुगतान का सिद्धांत महत्वपूर्ण सिद्धांतों के रूप में विकसित किए हैं। इन सिद्धांतों का मूल संदेश स्पष्ट है। संभावित पर्यावरणीय नुकसान को होने के बाद ठीक करने के बजाय पहले से रोकना आवश्यक है और प्रदूषण या पर्यावरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार पक्ष को उसके परिणामों की जवाबदेही से मुक्त नहीं किया जा सकता।

यही कारण है कि यह मामला टुंडे कबाबी के व्यापारिक हितों से कहीं बड़ा दिखाई देता है।

यदि किसी व्यावसायिक गतिविधि से पर्यावरणीय दबाव पैदा होता है, तो उसका भार आसपास के नागरिकों, कर्मचारियों और व्यापक पर्यावरण पर नहीं डाला जा सकता।

 

 

उर्वशी शर्मा की शिकायत ने खोला नियामकीय दरवाजा

उर्वशी शर्मा की जनशिकायत ने उस प्रशासनिक प्रक्रिया को सक्रिय किया जिसके परिणामस्वरूप संबंधित प्रतिष्ठानों का निरीक्षण हुआ और सूचना जारी की गई।

अब जिम्मेदारी केवल शिकायत के निस्तारण तक सीमित नहीं हो सकती।

जरूरत इस बात की है कि संबंधित विभाग यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करें कि निरीक्षण में वास्तव में क्या पाया गया, कौन-कौन से पर्यावरणीय प्रावधान लागू थे, किन अनुमतियों की कमी पाई गई, सूचना का अनुपालन हुआ या नहीं और वर्तमान स्थिति क्या है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या निरीक्षण के बाद केवल कागजी अनुपालन पूरा कराया गया या वास्तव में प्रदूषण नियंत्रण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की गई।

 

 

पाक कला की प्रसिद्धि” बनाम पर्यावरणीय जवाबदेही

किसी भी प्रसिद्ध प्रतिष्ठान की लोकप्रियता उसके लिए सम्मान का विषय हो सकती है, लेकिन लोकप्रियता कानून से ऊपर नहीं हो सकती।

टुंडे कबाबी के मामले में अब असली कसौटी उसके कबाब का स्वाद नहीं, बल्कि यह होगी कि उसके प्रतिष्ठान पर्यावरणीय कानूनों का कितना पालन करते हैं।

सरकारी अभिलेखों में दर्ज निरीक्षण और सूचना ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक क्रम सामने रखा है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि संबंधित अधिकारी उस क्रम को अंतिम अनुपालन तक ले जाते हैं या मामला केवल सूचना जारी करने और अभिलेख बंद करने तक सीमित रह जाता है।

थाली में प्रदूषण” अब केवल एक तीखा पत्रकारिता शीर्षक नहीं, बल्कि सरकारी अभिलेखों से उपजा एक गंभीर नियामकीय सवाल बन चुका है।

और इस सवाल का जवाब टुंडे कबाबी की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि दस्तावेज, निरीक्षण, वैध सहमति, प्रदूषण नियंत्रण व्यवस्था और वास्तविक अनुपालन ही दे सकते हैं।

 

Friday, November 4, 2022

यूपी के सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही पर सरकारी वाहनों के दुरुपयोग का आरोप.


 


लखनऊ / शुक्रवार, 04 नवम्बर 2022 ………………………

आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे की राजधानी लखनऊ स्थित सूचना आयोग में कार्यरत आयुक्तों में से एक हर्षवर्धन शाही द्वारा आयोग के जनसूचना अधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी को लिखे एक पत्र ने आरटीआई के हलके में हलचल मचा दी है. दरअसल मामला स्थानीय राजाजीपुरम निवासिनी तेजतर्रार समाजसेविका उर्वशी शर्मा की उस आरटीआई अर्जी से जुड़ा है जिससे डरे सूचना आयुक्त हर्षवर्धन को मजबूरन प्रशासनिक अधिकारी को बाकायदा पत्र लिखकर उर्वशी या अन्य किसी भी व्यक्ति को उनसे सम्बंधित सूचना नहीं देने की बात कहनी पड़ गई है.   

 

 

उर्वशी बताती हैं कि उन्होंने सूचना आयोग में एक आरटीआई अर्जी देकर 7 बिन्दुओं पर सूचना मांगी थी. बकौल उर्वशी अपने आरटीआई आवेदन के बिंदु संख्या 4 पर उन्होंने राज्य सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही को आबंटित सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स की सत्यापित प्रतियां मांगी थी जिसके सम्बन्ध में शाही ने लिखा है कि उनके वाहनों की लॉग-बुक्स की सूचना उनकी निजता से सम्बंधित हैं और इस सूचना के सार्वजनिक होने से उनकी सुरक्षा को खतरा हो जाएगा और इसलिए ये जानकारी उर्वशी अथवा अन्य किसी भी व्यक्ति को नहीं दी जाए.

 

 

शाही के इस पत्र के मजमून पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए देश की नामचीन एक्टिविस्ट्स में शुमार उर्वशी कहती हैं कि सरकारी खजाने से चलने वाले सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स सार्वजनिक दस्तावेज हैं और इससे पहले वे आयोग के वर्तमान मुख्य सूचना आयुक्त भवेश कुमार सिंह के सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स की सत्यापित प्रतियाँ आरटीआई में प्राप्त कर चुकी हैं.

 

 

भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश आरटीआई प्रकोष्ठ की पूर्व उपप्रभारी रहते हुए सपा सरकार के बड़े-बड़े घोटालों को उजागर कर चुकी उर्वशी बताती हैं कि हर्षवर्धन शाही द्वारा सरकारी वाहनों का दुरुपयोग करने की शिकायतें मोबाइल हेल्पलाइन 8081898081 पर प्राप्त होने पर ही उन्होंने शाही के सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स की सत्यापित प्रतियाँ आरटीआई में मांगी थी.

 

उर्वशी का कहना है कि सूचना आयोग आने-जाने के अतिरिक्त यदि सूचना आयुक्त और कहीं जाते हैं तो प्रोटोकॉल के तहत अपने कार्यक्रम निर्धारित करके जाते हैं और इन कार्यक्रमों के संपन्न हो जाने के बाद उनमें गोपनीय जैसा कुछ भी नहीं होता है. उर्वशी ने यह भी कहा है कि जो यात्राएं भूतकाल में हो चुकी हैं उनकी सूचनाएं सार्वजनिक होने से किसी भी व्यक्ति की सुरक्षा को खतरे जैसी कोई बात हो ही नहीं सकती हैं क्योंकि कोई भी भूतकाल में जा ही नहीं सकता है. मुख्य सूचना आयुक्त भवेश द्वारा अपने सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स की सत्यापित प्रतियाँ दे देने और शाही द्वारा अपने सरकारी वाहनों की लॉग-बुक्स की सत्यापित प्रतियाँ देने से मना करने के लिए कही हुई बातों को ऊल-जलूल बहानेबाजी बताते हुए इन आधारों पर उर्वशी ने शाही को सरकारी वाहनों के दुरुपयोग के लिए आरोपित करते हुए सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ को शिकायत भेजकर गहन जांच करवाने की बात कही है.

 

 

बकौल उर्वशी सूचना आयुक्त का काम अधिक से अधिक सूचना दिलवाना है लेकिन शाही द्वारा जनता के टैक्स के पैसों से चलने वाली सरकारी गाड़ियों का स्वयं द्वारा किया गया दुरुपयोग छुपाने के लिए सूचना देने से बचकाने आधारों पर मना करना उनका कदाचार है जिसके लिए वे सूबे की राज्यपाल को शिकायत भेजकर शाही के खिलाफ सूचना कानून की धारा 17 के तहत कार्यवाही शुरू करके शाही को बर्खास्त करने की मांग भी करेंगी.  

 

 


Saturday, July 20, 2019

RTI संशोधन विधेयक 2019 के जरिये आयोगों को बंधक बनाकर एक्ट को समाप्त करने की साजिश कर रही मोदी सरकार : उर्वशी शर्मा



लखनऊ / 20 जुलाई 2019 …………
भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा बीते कल लोकसभा में सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक 2019 पेश करने के बाद यूपी के आरटीआई कार्यकर्ताओं ने सूबे की नामचीन आरटीआई एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा की अगुआई में लामबंद होकर मोदी सरकार के खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया है l  बताते चलें कि इस विधेयक में यह उपबंध किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों व राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन एवं शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे।



उर्वशी की अगुआई में इकट्ठे हुए एक्टिविस्टों का कहना है कि इस विधेयक को लाने से पारदर्शिता के सवाल पर वर्तमान केंद्र  सरकार की प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान लग गया है l एक्टिविस्टों ने मोदी सरकार पर न्यूनतम पारदर्शिता और अधिकतम सरकार के सिद्धांत के आधार पर काम करने का आरोप भी लगाया है l  



एक्टिविस्टों की अगुआई कर रही समाजसेविका उर्वशी शर्मा ने बताया कि उन्होंने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर अवगत कराया है कि यदि यह  विधेयक कानून बन गया तो आरटीआई अधिनियम का  संस्थागत स्वरूप नष्ट हो जाएगा l बकौल उर्वशी सरकार का यह प्रयास है  कि सूचना आयोगों का अपना बंधक बनाकर इनकी स्वायत्तता समाप्त की जाए और आरटीआई एक्ट की व्यवस्थाओं को अव्यवस्थित करके ऐसे हालात बना दिए जाएँ कि सूचना का  अधिकार देश के नागरिकों को कोई परिणाम न दे सके l उर्वशी के अनुसार इस विधेयक के कानून बन जाने से आरटीआई का ढांचा सम्पूर्ण रूप से कमजोर होगा और यह विधेयक सूचना आयोगों की स्वतंत्रता को समाप्त करके सूचना आयुक्तों को अपने इशारों पर नचाने के  प्रशासनिक उद्देश्य से लाया गया है।



एक विशेष बातचीत में लखनऊ निवासी एक्टिविस्ट उर्वशी ने बताया कि अब तक  मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति 5 साल के लिए होती है लेकिन यदि यह विधेयक कानून बन जाता है तो केन्द्रीय और राज्य सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल होगा या कितना होगा इसका फैसला केंद्र सरकार करेगी l पहले मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की सेवा की शर्तें चुनाव आयुक्तों के समान होती थीं लेकिन अब शर्तें बदली जाएंगी l  केंद्र सरकार सूचना आयोगों की स्वायत्ता और स्वतंत्रता को समाप्त करके इस संवैधानिक संस्था को कानूनी संस्था बनाने जा रही है जो सही नहीं है l मूल कानून के अनुसार अभी मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों के बराबर है। ।

उर्वशी ने बताया कि इससे पहले साल 2018 में  भी केंद्र सरकार सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन और अन्य भत्तों को नियंत्रित करने के लिए बिल लाई थी लेकिन उन जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुखर विरोध के बाद आने वाले लोकसभा चुनावों के मद्देनज़र इसे इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था लेकिन अब  प्रस्तावित संशोधन विधेयक 2019 के जिन्न को फिर से जिन्दा करके मोदी सरकार  शक्तियों को केन्द्र सरकार के पास केन्द्रित करने की साजिश कर रही है जिससे भारत का संघीय ढांचा कमजोर होगा l

संशोधित विधेयक को आरटीआई कानून से प्रभावित होने वाले और जुड़े हुए लोगों के बीच विचार-विमर्श के लिए नहीं रखे जाने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए विधेयक को लोक सभा के पटल पर इस प्रकार रखे जाने को केंद्र सरकार की पूर्व-विधान परामर्श नीति का उल्लंघनकारी होने की बात भी उर्वशी द्वारा भेजे गए ज्ञापन में लिखी गई है l उर्वशी के अनुसार प्रस्तावित संशोधन विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 से मिले चुनाव आयुक्तों के समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है क्योंकि सरकार को कोई अधिकार नहीं है कि वह सूचना आयोगों  को अन्य ट्रिब्यूनलों से अलग माने l


उर्वशी ने बताया कि उन्होंने मांग की है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि यह विधेयक कानून न बनने पाए l उर्वशी ने बताया कि वे देश भर के आरटीआई एक्टिविस्टों के संपर्क में हैं और यदि केंद्र सरकार ने इस विधेयक पर अपने कदम जल्द ही बापस नहीं खींचे तो एक देशव्यापी जनांदोलन चलाकर मोदी सरकार के इस जनविरोधी कदम का चहुमुंखी पुरजोर विरोध किया जाएगा l


Thursday, October 11, 2018

यूपी : आरटीआई एक्ट की 13वीं सालगिरह पर राजधानी में होगा जनजागरूकता कार्यक्रम l

लखनऊ/11 अक्टूबर 2018 ..............

पूरे देश के सभी सरकारी कार्यालयों के कामकाज में पारदर्शिता लाने और सभी सरकारी कर्मचारियों की जबाबदेही का निर्धारण करने के लिए 12 अक्टूबर 2005 को  लागू हुआ सूचना का अधिकार अधिनियम समयपथ पर 13 साल की दूरी पार  करके 14वें साल में प्रवेश करने जा  रहा है l आरटीआई एक्ट की सालगिरह का जश्न मनाने के लिए यूपी की राजधानी स्थित सामाजिक संस्था ‘सूचना का अधिकार कार्यकर्ता एसोसिएशन’ आगामी 13 अक्टूबर को लखनऊ के हजरतगंज जीपीओ के पास स्थित सरदार बल्लभ भाई पटेल पार्क परिसर में दोपहर 12 बजे से एक निःशुल्क जनजागरूकता कार्यक्रम का आयोजन करने जा रही  है l इस बात की जानकारी देते हुए एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार शुक्ला ने बताया कि कार्यक्रम में आरटीआई गाइड और नियमावली का निःशुल्क वितरण भी किया जाएगा l



एसोसिएशन की संरक्षिका और देश की नामचीन समाजसेविका उर्वशी शर्मा ने बताया कि विगत दिनों यूपी में कई आरटीआई कार्यकर्ताओं की ह्त्या हुई है और कई को षड्यंत्र के तहत झूंठे आपराधिक मामलों में फंसाया गया है l बकौल उर्वशी कार्यक्रम के उद्घाटन से पूर्व मृत आरटीआई कार्यकर्ताओं की आत्मा की शांति के लिए 2 मिनट का मौन रखा जाएगा और कार्यक्रम के पश्चात सूबे के राज्यपाल और मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर आरटीआई कार्यकर्ताओं की ह्त्याओं के मामलों की और षड्यंत्र के तहत झूंठे आपराधिक मामलों में फंसाए गए आरटीआई कार्यकर्ताओं के प्रकरणों की जांच सीबीआई से कराये जाने की मांग की जायेगी l



कार्यक्रम में सूबे के मूर्धन्य आरटीआई कार्यकर्ताओं के शिरकत करने की बात भी अशोक कुमार शुक्ला ने कही है l 


Thursday, August 9, 2018

सुरक्षा से खिलबाड़ कर राजधानी के नाका हिंडोला थाने के सामने चल रहे होटल अर्जुन इंटरनेशनल पर कसा फायर डिपार्टमेंट और एलडीए का शिकंजा : एक्टिविस्ट उर्वशी शर्मा की शिकायत पर हुई कार्यवाही l









लखनऊ / 09 अगस्त 2018 .....................

बीते जून महीने में यूपी की राजधानी लखनऊ के चारबाग क्षेत्र स्थित होटल एसएसजे और होटल विराट में लगी भीषण आग में हुई मौतों के बाद लखनऊ का अग्निशमन विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण मानकों के खिलाफ चलाये जा रहे होटलों के खिलाफ सख्त हो गया है l ताजा मामला राजधानी के नाका हिंडोला थाने के सामने चल रहे होटल अर्जुन इंटरनेशनल का सामने आ रहा है l लखनऊ स्थित नामचीन समाजसेविका उर्वशी शर्मा द्वारा होटल अर्जुन इंटरनेशनल के मालिकों और प्रबंधन पर सुरक्षा से खिलबाड़ करके होटल संचालित करने का  आरोप लगाने वाली शिकायतों पर सख्त रुख अपनाते हुए  जहाँ एक तरफ लखनऊ के  मुख्य अग्निशमन अधिकारी ने होटल की ढांचागत सुरक्षा और अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था में दर्जन भर से अधिक खामियां सामने रख दी हैं तो वहीं दूसरी तरफ लखनऊ विकास प्राधिकरण  के जोन 6 के अधिशासी अभियंता ने होटल से मानचित्र और अन्य साक्षीय रिकॉर्ड लेकर जांच बैठा दी है l



समाजसेविका उर्वशी शर्मा ने बताया कि उनको शिकायत मिली कि होटल अर्जुन इंटरनेशनल के स्वामी ने आवासीय और व्यवसायिक मिश्रित भू उपयोग के लिए एलडीए से पास कराये गए नक़्शे को पूरी तरह से धता-बताकर अवैध रूप से मनमाना निर्माण कराया गया और एक ऐसी बिल्डिंग में होटल के साथ-साथ रेस्टोरेंट का व्यवसाय शुरू कर दिया गया जो ढांचागत सुरक्षा और अग्निशमन सुरक्षा के मामले में पूरी तरह से असुरक्षित था l बकौल उर्वशी लखनऊ के मुख्य अग्निशमन अधिकारी की रिपोर्ट में यह बात खुलकर सामने आ गई है कि होटल अर्जुन इंटरनेशनल होटल और रेस्टोरेंट चलाने के लिए पूरी तरह असुरक्षित है और यहाँ कभी भी कोई भी गंभीर हादसा हो सकता है l

उर्वशी ने बताया कि अग्निशमन विभाग की जांच रिपोर्ट  के अनुसार लगभग 20 मीटर की ऊंचाई वाला भूतल के आलावा 5 तलों वाला इस होटल के हरेक तल का कवर्ड एरिया लगभग 200 वर्ग मीटर है l होटल की बिल्डिंग में जीरो सेटबैक होने और केवल एक  मीटर चौड़ाई के एक ही जीना होने की बात कहते हुए उर्वशी ने इन दो आधारों पर भवन को अवैध रूप से निर्मित ढांचागत रूप से अति-असुरक्षित बताया है l भवन में पानी का भूमिगत टैंक नहीं होने, टेरेस टैंक मानक से एक चौथाई होने, सम्पूर्ण भवन में स्प्रिंकलर व्यवस्था नहीं होने,बिजली का वैकल्पिक स्रोत नहीं होने,होटल भवन के बेसमेंट में रेस्टोरेंट चलाने और हरेक शिफ्ट में 8 फायर प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के साथ साथ दर्जन भर से अधिक खामियों की बात मुख्य अग्निशमन अधिकारी की रिपोर्ट से सामने आई है l

लखनऊ विकास प्राधिकरण  के जोन 6 के अधिशासी अभियंता ने उर्वशी को पत्र भेजकर बताया है कि उनकी शिकायत पर होटल से मानचित्र और अन्य साक्षीय रिकॉर्ड लेकर जांच बैठा दी गई है l उर्वशी ने बताया कि वे जल्द ही एलडीए के उपाध्यक्ष से मिलकर मांग करेंगी कि जांच लंबित रहने के दौरान अवैध रूप से बने और ढांचागत रूप से असुरक्षित होटल अर्जुन इंटरनेशनल को तत्काल सील कराया जाए और अन्य बिन्दुओं के साथ-साथ मुख्यतः यह देखा जाए कि शून्य सेटबैक वाली इस बिल्डिंग का निर्माण कैसे हो गया और बिल्डिंग के अवैध निर्माण को चिन्हित करके  तत्काल ध्वस्त कराया जाए l